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  • नेपाल, चीन के शेयरधारकों से कारोबार करने के लिए तैयार है, जबकि आधी लागत में भारतीय कारोबारियों से कारोबार कर सकता है
  • चीन, श्री की तरह नेपाल को भी कर्ज के जाल में फंसा रहा है, भारत रख रहा है करीब से नजरिए से

दैनिक भास्कर

जुलाई 07, 2020, 06:11 AM IST

नई दिल्ली। आठ को आसान बनाने के लिए इंफ्रस्ट्रक्चर डेवेलपमेंट के नाम पर चीन की तरफ से दिया जा रहा है सस्ता लोन नेपाल के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी भारत की तुलना में चीन को ज्यादा तवज्जो देती रही है। दरअसल नेपाल को चीन के बेल्ट और रोड इशिष और (बीआरआई) रेलवे का लालच है।

भारत सरकार को इस बात की चिंता है कि नेपाल धीरे-धीरे चीन के कर्ज के जाल में फंस रहा है। भारत पड़ोस में हो रहे इस विवरण पर नजर से नजर रखी गई है।

चीन चीन बाकी देशों से व्यापार के माध्यम से
नेपाल दो देशों से घिरा हुआ है भारत और चीन। उसके पास कोई समुद्र नहीं है, इस कारण से बंदरगाह भी नहीं है। दूसरे देशों से व्यापार के लिए उसने भारत की जगह चीन को ब्रिटिश कॉन्ट्री (जहां के मनोरंजन से व्यापार हो सके) के रूप में चुना। मार्च 2016 में केपी शर्मा ओली की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों में दलित ट्रांसपोर्ट एग्रीमेंट (टीटीए) हुआ।

इसके तहत चीन ने नेपाल को सातिटिट प्वाइंट दिया। इसमें चार समुद्री बंदरगाह – तियानजिन, शेंज़ेन, लियाँयुगांग, ज़ाउनिंग हैं। इसके अलावा तीन लैंड पोर्ट- लैंज़ोऊ, ल्हासा, शिगात्से हैं। उनके माध्यम से नेपाल किसी तीसरे देश से व्यापार कर सकेगा। हालाँकि, यह निष्कर्ष नेपाल के लिए निवेश का है, लेकिन दोनों देशों की सरकारों ने नागरिकों को धोखा देने के लिए बड़े धूमधाम से इसे लागू किया जाएगा।

चीन के रूट से नेपाल को घाटा कैसे हुआ?

  • विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के लिए चीन के रूट से बाकी देशों से व्यापार भारत के रूट की तुलना में मंहगा साबित होगा। उदाहरण के तौर पर चीन के पूर्वी तट के किसी बंदरगाह से 20 फीट का कंटेनर लगभग 45 दिन में नेपाल पहुंचेगा, जबकि कोलकाता या हल्दिया से उसी कंटेनर में केवल 16 दिन में काठमांडू पहुंच जाएगा।
  • इसी तरह चीन के पश्चिमी इंडस्ट्रियल एरिया लैंज़ाओ से सामान आयात करने पर वह तिब्बत से होते हुए काठमांडू में 35 दिन में पहुंच गया।
  • चीन की ओर से नेपाल को अलाट किए गए चार समुद्री पोर्टों की काठमांडू से दूरी लगभग 4 हजार किलोमीटर है। इसमें से नेपाल के सबसे नजदीक लियानयुंगांग है, जो काठमांडू से 3950 किलोमीटर दूर है।
  • चीन के किसी भी तट से नेपाल आने वाले सामान का परिवहन खर्च भारत के तट से आने वाले खर्च से बहुत अधिक है।
  • नेपाल के व्यापारियों को चीनी चैनलों के माध्यम से अपने देश तक माल लाने के लिए बड़ी कीमत चुकानी होगी।
  • चीन ने नेपाल को झांसा देते हुए कहा है कि बेल्ट एंड रोड इनिशियन रेलवे पूरा होने पर इतना समय नहीं लगेगा। यह चीन का एक और झूठ है।

नेपाल बीआरआई रेलवे क्या है?
चीन के मुताबिक बेल्ट और रोड इशिष रेलवे रेलवे प्रोजेक्ट दक्षिणी तिब्बत के केरुंग शहर को नेपाल की राजधानी काठमांडू से ले जाती है।) इसके बाद यह रसुवा जिले में प्रवेश करेगा और अंत में भारत की सीमा पर निकलेगा। नेपाल के आम नागरिकों को भी इसकी पूरी होने की उम्मीद नहीं है। इसलिए वह इसे “कट्को रेल” (पेपर रेलवे) और “सनेसको रेल” (ड्रीम रेलवे) कहते हैं।

बीआरई रेलवे का पूरा होना मुश्किल क्यों?

  • चीन ने इस परियोजना पर काम शुरू करने से पहले एक स्टडी करवाई है। इसमें छह एक्स्ट्रीम प्वॉइंट निकलकर आए हैं।
  • इनमें टोपोग्राफी (भूमि की स्थिति), मौसम, अग्नि (जल विज्ञान) और टेक्टोनिक्स शामिल हैं। ये बिंदु ऐसे हैं, जो परियोजना को बहुत चुनौती देते हैं या शायद असंभव बना देंगे।
  • रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि नेपाल की ओर से 98% रेलवे ट्रैक ज्यादातर टनल और पुलों पर रहेगा। पूरे नेपाल में पांच पड़ाव बनाए गए हैं।
  • रेलवे ट्रैक को बहुत अधिक ऊंचे-नीची जगह पर बनाना होगा। तिब्बत में जहां 4000 मीटर की ऊंचाई है, वहीं काठमांडू में 1400 मीटर की ऊंचाई है।
  • प्रस्तावित रूट पहाड़ों से होते हुए एक मेजर फूट लाइन से भी गुजरेगा। इस फ्ट लाइन में भारतीय प्लेन यूरेशियन प्लेट से मिलती है। इसलिए यह क्षेत्र क्षेत्र के लिए अतिसंवेदनशील है।

इतनी सारी बाधाओं और चुनौतियों पर कोई भी समझ नहीं करेगा कि बेल्ट और रोड इनिशियल को पूरा करना असंभव है। अगर यह 2022 तक पूरा भी कर लिया जाए तो यह टिकेगा नहीं।





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By GAUTAM

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