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भारत के पड़ोस में लगातार अपना नेटवर्क मजबूत करने में लगे चीन को एक करारा झटका लग सकता है। श्रीलंका में नई सरकार ने काम संभाल लिया है और देश के विदेश सचिव, जयनाथ कोलोमलर ने ये साफ कर दिया है कि श्रीलंका क्षेत्रीय विदेश मंत्री ने कहा।इंडिया फर्स्ट“की नीति पर काम करना होगा… श्रीलंका भारत की सुरक्षा के खिलाफ कोई काम नहीं करेगा। हालांकि आज ही की तरह साल 2009 से 2014 तक श्रीलंका में महिंद राजपूत की ही सरकार थी। फ़र्क बस इतना है कि तब महेद राजपक्षे देश के राष्ट्रपति थे। शुरुआत के दिनों में तो भारत के साथ उनके संबंध मधुर थे, लेकिन सरकार का कार्यकाल समाप्त होते-होते संबंध में तल्ख़ हो गए थे।
चीन की चाल का शिकार श्री
महद्दा राजपक्षे ने 2005 से 2015 के बीच बतौर राष्ट्रपति दो कार्यकाल पूरे किए। उनके अधिकार चीन के लिए बहुत शुभ हो रहे हैं। राज विपक्षे चीन से कर्ज़ मांगते जाते हैं और चीन कर्ज़ देता है। श्रीलंका के सिर पर चीन का लगभग 83 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ हो गया और इसी तरह कर्ज़ के कारण दिसंबर 2017 में श्रीलंका को अपना हंबनटोटा बंदरगाह चीन के सुपुर्द करना पड़ा। चीन का जाना परखा फाॅर्मूला इंवेस्टमेंट यानी निवेश, श्री हो या मालदीव, पाकिस्तान हो या नेपाल। चीन इन देशों में खूब निवेश करता है और उन्हें कर्जा देता है। तरक्की के सुनहरे सपने हैं। फिर इसी कर्ज की राह वह वहाँ अपने सामूहिक हित साधना है।

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भारत श्री सम्मान
भारत को श्रीलंका का यह कदम नागवार गुज़रा था। श्रीलंका के विदेश सचिव ने कहा है कि इस बार ऐसा नहीं होगा, और भारत की सामरिक संवेदनाओं का ख़्याल रखा जाएगा, क्योंकि ऐसे न करना स्वयं श्री के लिए भी नुकसानदेह होगा। राज विपक्षे परिवार के कई सदस्य सरकार का हिस्सा हैं और राष्ट्रपति गोटाबाया और प्रधानमंत्री महंत ने फैसला किया है कि पिछली बार वाली गलती इस बार नहीं दोहरायी जाएगी। अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से हिन्द महासागर में श्रीलंका महत्वपूर्ण है, और न चाहते हुए भी वह एक तरफ भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका और दूसरी तरफ चीन के बीच चल रहे पावर गेम का गवाह रहेगा।



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