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वॉशिंगटन8 घंटे पहलेलेखक: थॉमस एल। फ्रेडमैन

मैंने डोनाल्ड ट्रम्प और डेमोक्रेट कैंडिडेट जो बाइडेन के बीच पहले प्रेसिडेंशियल डिबेट देखा। इस दौरान एक कल्पना मेरी आँखों के आगे सामने आ गई। मेरी तरह चीन के पोलितब्यूरो के सदस्य भी यह डिबेट देखने जुटे होंगे। जब भी ट्रम्प ने कोई मूर्खतापूर्ण बात कही होगी या तर्क रखा जाएगा तो चीनी पोलितब्यूरो के सदस्य भी मुस्कराए होंगे। अपने तरीके से इसका लुत्फ़ उठाया जाएगा। सिर्फ आधे घंटे में पोलितब्यूरो के 25 मेंबर नशे में चूर हो गए हैं।
ये पहले तो नहीं देखा होगा
और अगर वे नशे में चूर हुए तो क्या गलत है? होना भी चाहिए। क्योंकि, ये सब उन्होंने पहले नहीं देखा था। एक अमेरिकी राष्ट्रपति जिसका खुद पर कोई अति नहीं है। एक ऐसा लिएव्यक्ति जो प्रेसिडेंट बने रहने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। क्योंकि, अगर वह इस काम में नाकाम रहता है तो उसे कानूनी मसल्स और बेइज्जती का सामना करना पड़ेगा।
चीन को दोष देना सही है
चीन को दोष क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। कोरोनावायरस के साथ ही शहर वुहान से शुरू हुआ। और वर्तमान में इस पर अधिक पाया जा रहा है। लेकिन, हमारे देश अमेरिका में यह इकोनॉमी और नागरिकों को बर्बाद कर रहा है। इसके बावजूद हम कुछ भी कर पाने में कामयाब होते हैं।
कोरोना को मैं चीन के चेर्नोबिल की तरह देखता हूं। या इसकी तुलना पश्चिम के वॉटरलू से कर रहे हैं। इसके जिक्र जॉन मिकेलवेट और एड्रियन वुड्रिग ने अपनी पुस्तक जॉन द वे वेप कॉल ’में की है। बताया गया है कि कोरोना ने कैसे पश्चिमी देशों की कमजोरियों को उजागर किया है और इस पर कैसे अधिक पाया जा सकता है।
आंकड़ों की बात
जॉन एप्सिन्स यूनिवर्सिटी के कोरोना ट्रैकर की मानें तो अमेरिका में हर एक लाख पर 65.74 लोगों की मौत हुई। कुल मिलाकर 2 लाख 16 हजार लोग महामारी के चलते जान गंवा चुके हैं। चीन में हर एक लाख पर यह आंकड़ा 0.34 है। अब तक कुल 4750 लोगों की मौत हुई है। चलिए, मान लेते हैं कि चीन के आंकड़ों में झोल है, कुछ चौंकाने वाला है। इसलिए इसे चार गुना मान लेते हैं। इसके बावजूद यह मानना ​​होगा कि चीन ने अपने नागरिकों की रक्षा महामारी के दौरान अमेरिका से बहुत बेहतर तरीके से की है।
चीन और अमेरिका के हालात में कोई फर्क नहीं पड़ता
इस महीने की शुरुआत में ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम किया। ये सुपरस्प्रेडर इवेंट साबित हुआ। लाखों अमेरिकी बच्चों को स्कूल भेजने में डर रहे हैं। दूसरी तरफ, चीन में लोकल ट्रांसमिशन के मामले लगभग खत्म हो चुके हैं। वहाँ बसने और ट्रेन स्टेशन्स और टर्मिनल के देखने के लिए है। लाखों लोग यात्रा कर रहे हैं। नेशनल हॉलीडे मनाए जा रहे हैं। 1 अक्टूबर को ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया है कि बारह साल में पहली बार चीन की करंसी ने किसी तिमाही में सबसे अच्छी रेटिंग पाई है। सितंबर में इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट दोनों बेहतर हुए।
वो हमारे जैसे हो गए हैं
हम चीन की तुलना पश्चिमी देशों से करते हैं। 1960 की दशक की बात की जाती है। कहा जाता है कि अमेरिका ने जब पहला आदमी चांद पर भेजा था, तब चीन में लाखों लोग भूख से मर रहे थे। ब्लूमबर्ग के एडिटर इन चीफ मिकेलवेट ने मुझे बताया- यह वो वक्त था जब 75 फीसदी अमेरिकी अपनी सरकार का समर्थन करते थे। लेकिन, द इकोनॉमिस्ट के पॉलिटिकल एडिटर वुलड्रिज कहते हैं- पांच सौ साल का इतिहास अब बदल गया है। चीन अब आगे है। हम पुरानी बातों को भूल गए। चीन भूला नहीं। अगर हम अब भी नहीं जागे तो क्या होगा।
फिर क्या किया
अमेरिका को सुधार करना जरूरी है। कोविद -19 से सामना के लिए चीन जैसा राष्ट्रीय योजना बनाना होगा। वायरस को कंट्रोल करने के लिए कदम उठाने होंगे और इसके लिए राजनीतिक तौर पर एकराय कायम करना होगा। चीन के फेशियल रिकग्निशन तकनीक बहुत अच्छी है। सक उतारने की भी जरूरत नहीं होती है। आंखें और नाक का ऊपरी हिस्सा ही संक्रमण की जानकारी दे देता है। अमेरिका में चीन जैसी सरकार और प्रशासन संभव नहीं है। हम तानाशाही चाहते हैं भी नहीं। लेकिन, ये भी सही है कि हम लोकतांत्रिक तरीके से यह काम नहीं कर पाएंगे। जापान और जर्मनी ने सेकंड वर्ल्ड वॉर और नॉर्थ कोरिया के अलावा रूस को कोल्ड वॉर के दौरान यही किया। अमेरिका इसलिए आगे रहा क्योंकि उसने इसके लिए तैयारी की थी।
ये देश तब कामयाब रहे
28 मार्च को ट्रम्प ने कहा था- हम एक ऐसे दुश्मन से जंग लड़ रहे हैं जो दिखाई नहीं देते। सबको साथ मिलकर इससे लड़ना होगा। दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और न्यूजीलैंड ने दिखाया है कि लोकतंत्र होते हुए भी महामारी जैसी चुनौतियों का कामयाबी से मुकाबला किया जा सकता है। राज्य और केंद्र सरकारों के बीच तालमेल है। हमारे यहाँ निर्भर और सच्चाई की कमी है। सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे पास एक ऐसा राष्ट्रपति है जो दोबारा चुनाव जीतने के लिए हमें बांट रहा है। मास्क जरूरी है, लेकिन ट्रम्प इसका मजाक उड़ाते हैं। हमारे बीच भरोसे की कमी हो गई है।
बाइडेन से उम्मीद
मुझे लगता है कि बाइडेन के पास चुनाव जीतने का सही मौका है। क्योंकि, अमेरिकी यह मानने लगे हैं कि बाइडेन ही हमें बंटवारे से फिर एकजुट या एकता की ओर ले जा सकते हैं। लेकिन, सिर्फ बाइडेन की जीत ही पर्याप्त नहीं है। लेकिन, यह जरूरी है तो बिल्कुल है। वर्तमान में, चीन और रूस से यह अपील है कि हमारे मामले में हस्तक्षेपल न दें। क्योंकि, हम वर्तमान में नहीं हैं, जैसे हुआ करते थे।





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By GAUTAM

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