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दैनिक भास्कर

जुलाई 09, 2020, 12:35 AM IST

239 वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि कोरोनावायरस एयरबोर्न है यानी हवा में भी जिंदा रहता है और बंद कमरे में भी लोगों को शिकार बना सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी अब इस दावे को मान लिया है।

डब्ल्यूएचओ का पहला दावा था कि कोरोनावायरस मुख्य रूप से ड्रॉपलेट्स की वजह से फैलता है, जो खांसी या छींक के जरिये शरीर से बाहर निकलते हैं और सतह पर गिरते हैं, लेकिन 32 देशों के 239 वैज्ञानिकों ने दो ओपन लेटर में प्रमाणों के साथ दावा किया। उस हवा में मौजूद छोटे हिस्से में कई घंटे तक संपर्क में आए लोगों को शिकार बना सकते हैं। इसके बाद WHOO ने भी इसे मान लिया। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रिसर्चर्स ने अगले सप्ताह आने वाली साइंटिफिक जर्नल में यह रिसर्च देने का फैसला किया है।

डब्ल्यूएचओ ने पहले दावा किया था कि माना नहीं गया था
डब्ल्यूएचओ ने भी 29 जून को अपने लेटेस्ट अपडेट में कहा था कि यह वायरस हवा में केवल फैल सकता है, जब मेडिकल प्रोसीजर की वजह से एयरोसोल या पांच माइक्रोन से छोटी ड्रॉपलेट्स बनती हैं। एक माइक्रोन यानी मीटर का दस लाखवां हिस्सा। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, ऐसी स्थिति में सही वेंटिलेशन और एन 95 सेकंड ही इंफेक्शन से बचा सकता है।

इससे पहले तक WHO का कहना था कि हाथों की धुलाई से कोरोनावायरस से बचा जा सकता है। हालांकि, केंद्र फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंसन का कहना है कि सतह से वायरस फैलने का खतरा बहुत कम है। डब्ल्यूएचओ के इंफेक्शन कंट्रोल में टेक्निकल लीड डॉ। बेनेडेट एलेग्रांजी ने कहा कि हवा से वायरस फैलने के संबंध में प्रमाण पत्र नहीं थे।

वैज्ञानिकों के दावे का आधार क्या है?
कोरोनवायरस हवा में छोटी-छोटी ड्रॉपलेट्स के तौर पर कई घंटों तक रह सकता है और सांस लेने पर लोगों को अपना शिकार बना सकता है। यह विशाल भीड़भरे कमरे और हॉल में बढ़ जाता है, जहां हवा का फ्लो अच्छा नहीं है।

हालांकि, वर्जिनिया टेक में एरोसॉल एक्सपर्ट लिनसे मार का कहना है कि इस बारे में दावा के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है कि छींकने या खांसी के साथ शरीर से बाहर निकलने वाली बड़ी ड्रॉपलेट्स की तुलना में इन छोटी ड्रॉपलेट्स या एयरोवोल की वजह से कोरोनावायरस फैलने लगती है। ? कितना है?

एयरोसोल क्या है और यह ड्रॉपलेट्स से अलग कैसे है?
एयरोसोल ड्रॉपलेट में होते हैं और ड्रॉपलेट एयरोसोल होते हैं। आकार के सिवाय दोनों में कोई फर्क नहीं पड़ता। वैज्ञानिक पांच माइक्रोन से कम आकार के ड्रॉपलेट्स को एयरोसोल कहते हैं। इसे आप ऐसी समझ सकते हैं कि रेड ब्लड सेल का एक सेल का डायमीटर पांच माइक्रोन होता है, जबकि इंसान के एक बाल की चौड़ाई 50 माइक्रोन होती है।

शुरू से डब्ल्यूएचओ और अन्य एजेंसियों का मानना ​​था कि कोरोनावायरस ड्रॉपलेट्स से फैलता है। छींक या खांसी के दौरान निकलने वाली बड़ी ड्रॉपलेट्स भारी होती हैं और वह तत्काल सतह (जमीन) पर आ जाती हैं। इसी कारण से सतह छूने से बचने की सलाह दी गई थी। साथ ही बार-बार हाथ धोने और सैनिटाइजर के इस्तेमाल की सलाह दी जा रही थी। सोशल डिस्टेंसिंग की सलाह का आधार यह भी था कि एक व्यक्ति के शरीर से बाहर निकलने वाली ड्रॉपलेट्स छह फीट के दायरे में दूरी तय करती हैं।

ड्रॉपलेट्स की तुलना में एयरोसोल खतरनाक क्यों?
विशेषज्ञों का दावा है कि कोरोना पीड़ित खांसी और छींक के दौरान एयरोसोल भी छोड़ रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एयरोसोल उस समय भी शरीर से निकलते हैं, जब लोग सांस लेते हैं, बात करते हैं या गीत गाते हैं। वैज्ञानिकों को पता है कि सिम्पटम न होने पर भी लोग वायरस फैला सकते हैं। यानी खाँसी या छींक के बिना भी। तब पक्के तौर पर एयरोसोल ही इसकी वजह होगी।

एयरोसोल आकार में छोटे होते हैं और इसमें ड्रॉपलेट्स की तुलना में कम मात्रा में वायरस हो सकता है। चूंकि ये हल्के होते हैं, इसलिए कई घंटे तक हवा में बने रह सकते हैं। खासकर ताजा हवा के अभाव में। भीड़भरी जगहों पर एक ईमानदार व्यक्ति इतना एयरोसोल छोड़ सकता है कि वह कई लोगों को बीमार कर दे।

किसी वायरस के हवा में फैलने का मतलब क्या है?
एक वायरस हवा में फैलता है, तो इसका मतलब यह है कि वह हवा में भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है। सभी वायरस को एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। मसलन, एचआईवी शरीर के बाहर जीवित नहीं रह सकता है, इसलिए वह एयरबोर्न नहीं है। मीसल्स एयरबोर्न है और खतरनाक भी। वह वायरस हवा में दो घंटे तक जिंदा रह सकता है।

कोरोनावायरस के लिए परिभाषा जटिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस ज्यादा दूरी तय नहीं कर सकता है और ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकता है। लेकिन प्रमाण बताते हैं कि यह बंद कमरे में दूरी तय कर सकती है और प्रयोगों में यह भी साबित हुआ कि हवा में यह तीन घंटे तक जिंदा रहेगा।

क्या फिजिकल डिस्टेंसिंग और हाथों की धुलाई की चिंता बंद कर देना चाहिए?
शारीरिक दूरी बनानाकर रखना बहुत आवश्यक है। ईमानदार व्यक्ति के आप जितना करीब होंगे, उतना ही एयरोसोल और ड्रॉपलेट्स का एक्सपोजर होगा। हाथों की धुलाई अब भी अच्छी है। नई बात यह है कि इतना काफी नहीं है। फैस के इस्तेमाल पर भी फोकस करना होगा।

जोखिम को कम करने के लिए मैं क्या कर सकता हूं?

  • जितना संभव हो, बाहर रहें। बहती हवा के साथ समुद्री तट पर जब रहनााना किसी भी स्थिति में नौका या इनडोर रेस्तरां में जब ठहरना से बेहतर है।
  • बाहर निकलने में भी पहलू पहनकर रखें और ज्यादा देर तक अन्य लोगों के संपर्क में न आएं। फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करें।
  • इनडोर में भी कोशिश करें कि दरवाजे-खिड़कियां खुली रहें। एयर-बेस सिस्टम अपग्रेड करें। सेटिंग्स को इस तरह करें कि बाहरी हवा का ज्यादा इस्तेमाल हो सके और अंदर की हवा ही रीसर्कुलेट न होती रहे।
  • सार्वजनिक भवनों और कमर्शियल स्थानों को एयर प्यूरी टेलर्स के साथ-साथ अल्ट्रावायलेट लाइट्स पर खर्च करना होगा, जिससे वायरस को खत्म किया जा सकेगा।
  • स्वास्थ्य वर्कर्स को एन 95 फेस पहनना ही चाहिए, जो ज्यादातर एयरोसोल को फिल्टर कर रोक देता है। इस बार उन्हें सिर्फ मेडिकल प्रोसीजर के दौरान ही ऐसा करने को कहा जाता है।
  • कपड़े के फंक्शन भी जोखिम को काफी हद तक कम कर देते हैं। घरों में जब आप अपने परिवार के साथ होते हैं, या रूममेट्स के साथ हैं तो फ़ंक्शन उतार सकते हैं। लेकिन यह सुनिश्चित करें कि वह भी सावधानी बरतें।
  • यदि आप घर के बाहर अन्य लोगों के आने-जाने वाली इनडोर जगहों पर जा रहे हैं, तो आपको ज़रूर पहनना चाहिए।





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