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कोई उन्हें मौसम वैज्ञानिक की संज्ञा देता है तो कोई उन्हें दुखने पैदल ही 12 जनपथ के आवास पर पहुंच जाता है। वह युवा नेता जो जब चुनावी समर में उतरता है तो अपना नाम गिनीज बुक में दर्ज करवा लेता है। पिछले तीन दशक में दिल्ली की तख्त पर चाहे कोई भी पार्टी किसी भी गठबंधन की सरकार रही हो हरेक सरकार में उसकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। हम बात कर रहे हैं भारतीय राजनीति के ऐसे राजनेता की जिनके हर दांव में स्कैनर पर पड़ रहा है।
धरती गूंजे आसमान-रामविलास पासवान हाजीपुर व वैशाली के किसी क्षेत्र में रामविलास पासवान कदम रखते हैं तो यह नारा जरूर सुनाई दे सकता है। 1989 में हाजीपुर के किसी कार्यकर्ता के मुंह से निकले हुए, पासवान के साथ ही पूरे बिहार में काफी सर्कुलर हो चुका है।

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वर्ष 2004, वर्ष का पहला दिन यानी 1 जनवरी, सोनिया गांधी अपने 10 जनपथ निवास से निकलती हैं। एसएसपी सुरक्षा के साथ गोलचक्कर को पैदल पार करती हैं और 12 जनपथ के गेट पर पहुंचती हैं। 12 जनपथ यानी रामविलास पासवान का आवास। सोनिया की यह छोटी सी पदयात्रा समसामयिक राजनीतिक इतिहास में एक बड़ी घटना बनकर उभरी। सोनिया गांधी को इससे पहले दिल्ली की सड़कों पर टहलते शायद ही किसी ने देखा होगा। सोनिया ने रामविलास पासवान से कोई अपॉइंटमेंट नहीं लिया था। केवल उनके दफ्तर ने यह चेक किया था कि पासवान घर पर हैं या नहीं। वह बिना ऐलान किए, बिना किसी अपॉइंटमेंट के और बिना किसी सूचना के वहां पहुंचीं। पासवान के लिए भी यह बेहद आश्चर्यजनक घटना थी, लेकिन वह सोनिया की गर्मजोशी, पहल और राजनीतिक सूझबूझ के कायल हो गए। पासवान की पार्टी उस वक्त अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता में थी और ऐसे में सोनिया का गठजोड़ बनाने के लिए उनके पास आना पासवान के लिए बड़ी बात थी। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है।
वर्ष 2014, आम चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर दिल्ली का 12 जनपथ सुर्खियों में था। इस बार भाजपा के वरिष्ठ नेता रामविलास पासवान से मुलाकात करने आए थे। इस बैठक के बाद देर रात लोकसभा चुनाव में लोजपा और बीजेपी के गठबंधन की घोषणा हुई। इतिहास की ये दो घटनाएं बताने के लिए काफी हैं कि भारतीय राजनीति में रामविलास पासवान की यही अहमियत है। वे एक ही वक्त में दो विपरीत छोरों पर खड़े लोगों के बीच सहज हो सकते हैं। लगभग पचास साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने ऐसा बखूबी कर दिखाया है।
सिविल सेवा से राजनीति
रिकॉर्ड वोटों से जीतने वाले, रिकॉर्ड नंबर आफ सरकार में रहने वाले मोदी सरकार के दलित चेहरा। खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान के राजनीतिक जीवन पर नजर डालें तो एक बेहद ही साधारण परिवार, राजनीति की कोई विरासत नहीं है, न कोई गॉडफादर और न ही उच्च जाति के होने की ताकत। उस दौर में पासवान का राजनीति में टिक जाना ही भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार है। इतनी मामूली पृष्ठभूमि का एक नेता इतने दिनों तक सारांश के आसपास लगातार मौजूद है। राम विलास पासवान का जयंम 5 जुलाई 1946 के दिन बिहार के खगरिया जिले में एक दलित परिवार में हुआ था। पासवान ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी से एमए और पटना विश्वविद्यालय से एलएलबी किया है। पासवान के प्रारंभिक जीवन की बात करें तो छात्रजीवन के बाद वे पटना विश्वविद्यालय पहुंचे और परास्नातक तक की पढ़ाई की। बिहार पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति के मैदान में उतरे रामविलास पासवान शुरू से ही राज नारायण और जयप्रकाश नारायण के फॉलोवर रहे हैं। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता है। पासवान लोकदल के महासचिव नियुक्त हुए। इमरजेंसी के दौरान वे राजनारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेहद करीब थे। पासवान ने अपना पहला विधानसभा चुनाव 1969 में लड़ा और वे चुनाव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर थे। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो वे आंदोलनकारियों में शामिल होने के कारण गिरफ्तार कर लिए गए और लगभग दो साल जेल में बिताए। जेल से छूटने के बाद पासवान जनता पार्टी के सदस्य बने और संसदीय चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे।

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हाजीपुर ने हूर और दो बार चखाया खो का स्वाद भी बनाया
बिहार के हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र का मन-मिजाज अपने अगल-बगल के संसदीय क्षेत्र से जुदा है। हाजीपुर के संसदीय चुनाव के इतिहास पर नजर डालेंगे तो क्या यहां के लोग अपने नेता को दिल में इस कदर बसा लेते हैं कि दूसरे के लिए दिल में कोई जगह ही नहीं बचती। वर्ष 1977 में रामविलास पासवान ने 4.24 लाख वोट से चुनाव जीतकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाया था। लेकिन उसके ठीक आठ साल बाद चुनावी जीत का रिकॉर्ड कायम करने वाले पासवान उसी हाजीपुर से 1984 में भी हारे थे। 1983 में इंक दलित सेना की स्थापना की। पासवान के अनुसार यह संगठन पूरी तरह से दलितों के उत्थान के लिए समर्पित था। काशीराम और मायावती की लोकप्रियता के दौर में भी, बिहार के दलितों के मज़बूत नेता के तौर पर लंबे समय तक टिके रहे हैं। साल 1989 में पासवान हाजीपुर से जनता दल के टिकट पर पांच लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने वाले एक नए रिकॉर्ड बना देते हैं। इस जीत के बाद वह वीपी सिंह की कैलकुलेटर में पहली बार शामिल किए गए और उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया।

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राजनीति के मौसम वैज्ञानिक
मौसम वैज्ञानिक यानी जो पहले ही भांप ले की कौन जीतने वाला है और फिर वो उस दल या गठबंधन के साथ हो लेते हैं। पासवान परिवार की निष्ठा मौसम के हिसाब से बदलती रहती है। इसलिए उन्हें सियासत का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है। अतीत के पन्ने पलटेंगे तो रामविलास पासवान देवगौड़ा सरकार में भी मंत्री थे। 1999 में वायपेयी सरकार में भी मंत्री बने। 2004 में यूपीए की सरकार बनी तो पासवान वहां भी मंत्री बने। 2013 तक यूपीए में रहे लेकिन 2014 के चुनाव में पाला बदल गया।

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छह प्रधान समुदायों के साथ किया है
पिछले तीन दशक में केंद्र की सत्ता में आए हर राजनीतिक गंठबंधन में शामिल रहे और मंत्री बने। राजनीतिक गलियारे में पासवान को इसीलिए विरोधी सबसे सटीक सियासी मौसम विज्ञानी का तंज भी कसते हैं। सियासी हवा का रुख भांपकर गठबंधन की बाजी चलने की यह काबिलिटी ही है कि अपने अस्तित्व के करीब तीन दशकों में लोजपा ज्यादातर समय केंद्र की सत्ता का हिस्सा रही है। रामविलास पासवान के नाम छह प्रधानमंत्रियों की कैलकुलेटर में मंत्री के तौर पर काम करने की सकारात्मक अधिसूचना जुड़ी है। इनमें नैशनल एमईसी, यूके लिमिटेड, एनडीए, यूपीए सब शामिल हैं। ब्रिटेन की सरकार के कार्यकाल में चूंकि दोनों प्रधानमंत्री- एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल राज्यसभा के सदस्य थे, इसलिए उस दौरान पासवान लोकसभा में सत्ता पक्ष के नेता रहे। बाबू जगजीवन राम के बाद बिहार में दलित नेता के तौर पर पहचान बनाने के लिए उन्होंने आगे चलकर अपनी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपाकी स्थापना की। इसकी सियासी यात्रा भी सत्ता की रोशनी से ही शुरू हुई। वाजपेयी की एनडीए सरकार में मंत्री रहे राजन का राजनीतिक कौशल ही रहा कि जो जदयू से अलग होकर लोजपा बना, वह भी एनडीए का हिस्सा बनी रही। लेकिन 2004 के चुनाव में एनडीए ने भारत शाइनिंग का क्या अंजाम होने वाला है इसे पासवान पहले भांप गए थे। 2004 के चुनाव से ठीक पहले रामविलास पासवान गुजरात। दंगा के नाम पर एनडीए का साथ छोड़ यूपीए में शामिल हो गए। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में पासवान का चिपक गलत बैठा। वो कांग्रेस का साथ छोड़कर लालू के साथ हो लिए। लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि वो अपनी हाजीपुर तक की सीट पर नहीं टिक पाए। बचा पाया। जिसके बाद उन्हें पूरे पांच साल तक सत्ता सुख से वंचित होना पड़ा। ये और बात है कि उस वक्त लालू प्रसाद यादव की मदद से राम विलास पासवान राज्य सभा में पहुंचने में कामयाब हो गए थे। 2014 में मोदी लहर को भानप भवन एनडीए में शामिल हो गए और अभी भी सरकार में मंत्री भी हैं।

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मीरा कुमार और मायावती से चुनीवी पिकड़ंत
बिजनौर लोकसभा सीट के लिए 1985 का साल बेहद ही खास है। जिस चुनाव में दलित राजनीति के उफान को पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार ने महसूस किया है। इस लोकसभा उप चुनाव का परिणाम चाहे जो रहा हो लेकिन इसके नेताओं ने अपनी जीत के लिए जी-तोड़ कोशिश की थी। 1985 के उप चुनाव के लिए एक महिला उम्मीदवार प्रचार के लिए सायकिल के सहारे थे। अपने सायकिल के जरिये वो बिजनौर की गलियाँ छानते हुए लोगों से मिलते हुए अपनी जीत के लिए सत्ता की लड़ाई लड़ रहे थे। ये कोई और नहीं बल्कि बसपा सुप्रीमों मायावती थे। जो अपनी पहली लोकसभा उपचुनाव लड़ रहे थे। मायावती के मुकाबले एक और दलित चेहरा मैदान में जो ब्रिटेन, स्पेन और मारीशस के भारतीय दूतावासों में अपनी सेवा देने के बाद उस चुनावी मैदान में उतरी थे और वह नाम था बाबू जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार का। लेकिन 1985 के इस चुनाव में एक और दलित नेता की एंट्री होती है। रामविलास पासवान ने भी बिजनौर का उपचुनाव फा। बिजनौर का ये चुनाव भारतीय राजनीति को बदल देने वाला था। बड़े-बड़े दिग्गज के बीच घमासान हुआ। कांग्रेस, लोकदल और मायावती के बीच त्रिकोणीय की तुलना में मीरा कुमार ने अपने पहले ही चुनाव में दिग्गज दलित नेता रामविलास पासवान और बीपीपी प्रमुख मायावती को हरा दिया। इस चुनाव में रामविलास पासवान दूसरे और मायावती तीसरे नंबर पर रहे।

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2005 के चुनाव में किंग मेकर बनने की चाह में पूरी सियासत बंटी गई
2005 से 2009 रामविलास के लिए बिहार की राजनीति के हिसाब से मुश्किल दौर था। 2005 में वे बिहार विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने या लालू-नीतीश की लड़ाई के बीच सत्ता की कुंजी के बारे में उतरने का दावा कर रहे हैं। फिर मिनक मुख्यमंत्री बनाने के बदले समर्थन की बात करते रामविलास की जिद गवर्नर बूटा सिंह ने फिर से चुनाव की स्थिति बनाकर उनकी राजनीति को और बड़ा झटका दिया। नवंबर में हुए चुनाव में लालू प्रसाद का 15 साल का राज चला गया, रामविलास की पूरी सियासत बंटी गई। बिहार में सरकार बनाने की चाबी अपने पास होने का उनका दावा धरा रह गया। वे चुपचाप केंद्र की राजनीति में लौट आए।
राम विलास पासवान का लगभग छह प्रतिशत का वोट एक तरह से कंप्लीट ट्रांसफ़रबल माना जाता रहा है, यही कारण है कि राष्ट्रीय राजनीति में पासवान का जादू हमेशा कायम रहा है। यही कारण है कि हर कोई राम विलास पासवान को अपने साथ जोड़े हुए रखना चाहता है। हालांकि, राम विलास पासवान अपनी पार्टी के तमाम फैसलों को लेने के लिए चिराग को अधिकृत कर चुके हैं। उनके पिता अपनी राजनीतिक चतुराई के लिए जा रहे हैं, अब ये चुनौती चिराग के सामने है।
– प्रदर्शन आकाश



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