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  • नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी, तुरिज्म मिनिस्टर योगेश भट्टुई और शेफ ऑफ आर्मी स्टाफ से यांगकी के अच्छे संबंध
  • कोविद -19 से सामना के लिए होउ ने ही चीन और नेपाल के राष्ट्रपति की फोन पर बात की थी

दैनिक भास्कर

Jul 06, 2020, 07:33 PM IST

काठमांडू। चाइनीज डिप्लोमैट होउ यांगकी को नेपाल में सबसे पावरफुल विदेशी डिप्लोमैट माना जा रहा है। नेपाल के प्रधान के दफ्तर से लेकर आर्मी हेडक्वार्टर तक उनकी सीधी पहुंच है। नेपाल के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ पूर्णचंद्र थापा उनके करीबी माने जाते हैं। 13 मई को चीन की एम्बेसी में एक डिनर हुआ था। इसमें थापा शेफ पूर्वानुमान थे। राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी, तुरिज्म मिनिस्टर योगेश भट्टुई भी यांगकी भी उनसे मिलत रहे हैं। कोविद -19 से सामना के लिए चीन ने जो कन्साइमेंट नेपाल को सौंप दिया था। उसे जनरल थापा ने ही रिसीव किया था।

भारत-नेपाल सीमा विवाद में भी यांगकी की भूमिका
नेपाल के नए नक्शे और भारत-नेपाल सीमा विवाद में भी यांगकी की भूमिका अहम मानी जा रही है। मानचित्र विवाद के अलावा अब यांगकी ओली सरकार की मुसीबतें कम करने में शुरू हुईं हैं। शुक्रवार को उन्होंने राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से मुलाकात की थी। भंडारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) की नेता रह चुके हैं। रविवार को यांगकी पूर्व प्रधान माधव कुमार नेपाल से मिलने उनके घर पहुंची थीं।

नेपाल और चीन के लिए बिचौलिए का काम कर यांगकी रहे
अप्रैल के शुरुआत में जब नेपाल में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे थे, तब चाइनीज डिप्लोमैट ने ही कवरेज पर नेपाल की राष्ट्रपति और चाइनीज प्रसीडेंट शी जिनिपंग की बात करवाई थी। यहीं नहीं 27 अप्रैल को चीनी दूतावास ने एक बयान जारी कर कर नेपाल की जनता को भरोसा दिलाया था कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए चीन हर कदम पर नेपाली नागरिकों की मदद करेगा।

भारतीय मीडिया के विरोध के बाद दी गई थी सफाई
पिछले सप्ताह जब भारतीय मीडिया ने होउ को नक्शा विवाद में शामिल होने का आरोप लगाते हुए खबरें थीं, तो होउ ने नेपाल के प्रमुख दिज द राय पैकेजिंग नेपाल और गोरखपत्र को 1 जुलाई को एक लंबा चौड़ा इंटरव्यू दिया था। जिसमें उन्होंने कालापानी सीमा विवाद पर सफाई देते हुए कहा कि कुछ मीडिया समूह के लोगों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। कालापानी नेपाल और भारत के बीच का मुद्दा है। उन्होंने इसमें चीनी हस्तक्षेपल होने से साफ इनकार कर दिया था।

मई में बचाई ओली सरकार थी
मई के पहले सप्ताह में भी ओली की कुर्सी जाने वाली थी। तब भी होउ यांगकी एक्टिव हुईं थीं। उन्होंने ओली के मुख्य विरोध पुष्प कमल दहल प्रचंड से मुलाकात की थी। कई और दूसरों से भी मिलीं। किसी तरह ओली की सरकार तब बच गई थी। इस बार परेशानी ज्यादा है। इसकी वजह ये है कि स्टैंडिंग कमेटी के 40 में 30 मेंबर प्रधानमंत्री से रिजफे की मांग कर रहे हैं।





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