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PATNA : विधानसभा की परंपरागत सीटों के प्रति भाजपा के आग्रह से बहुत हद तक दलबदल पर ब्रेक लगने की संभावना बन रही है। इसने हाल में राजद से जदयू में शामिल हुए कुछ विधायकों को भी डरा दिया है। संभव है कि पहले चरण में आए इन विधायकों के लिए कोई रास्ता निकल जाए। भाजपा संकेत दे रही है कि वह इसे प्रवृति नहीं बनने देगी। जदयू से दोबारा दोस्ती के कारण भाजपा की कई परंपरागत सीटें पहले ही फंसी हुई हैं। दिक्कत इसलिए पैदा हो रही है कि 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद के उम्मीदवार को पराजित करने के बाद ही जीते थे। उस समय एनडीए में साथ चार दल थे। रालोसपा और हिंदुस्‍तानी अवामी मोर्चा अलग हो गए। भाजपा और लोजपा साथ हैं। अब राजद के विधायक अगर एनडीए में शामिल हो रहे हैं तो वे उन्हीं सीटों पर उम्मीदवार बनेंगे, जहां पिछले चुनाव में भाजपा या लोजपा के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे। भाजपा का एतराज भी इसी मुद्दे पर है।

बहरहाल, राजद से जदयू में आए छह विधायकों के मामले में भी परंपरागत सीट का मामला उठ सकता है। हालांकि, लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा-जदयू ने सीटों के बंटवारे के मोर्चे पर जिस असंभव को संभव कर दिखाया था, उसे देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि दलबदल कर आए इन विधायकों को मायूस नहीं होना पड़ेगा। लेकिन, भाजपा के आग्रह के बाद जदयू में राजद के विधायकों की गैर-जरूरी एंट्री भी नहीं हो पाएगी। भाजपा के लिए सासाराम विधानसभा सीट हर लिहाज से परंपरागत है। 1990-2015 के बीच सात चुनाव हुए। पांच बार भाजपा की जीत हुई। खास बात यह है कि इन सात चुनावों में भाजपा के उम्मीदवार जवाहिर प्रसाद ही रहे। 2015 में जदयू की मदद से राजद उम्मीदवार अशोक वर्मा की जीत हुई। वर्मा अब जदयू में आ गए हैं। केवटी के राजद विधायक फराज फातमी जदयू में आ गए हैं।

1977 में जनता पार्टी के टिकट पर जीते दुर्गा दास राठौर जनसंघ के थे। बीच के चुनावों में कांग्रेस और राजद की जीत हुई। 2005 के दो और 2010 के विधानसभा चुनाव में केवटी में भाजपा की जीत हुई। 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा टिकट पर हारे अशोक यादव अब मधुबनी से भाजपा के सांसद हैं। भाजपा केवटी के लिए किसी नए उम्मीदवार की तलाश कर ही रही थी कि फराज जदयू में आ गए। पालीगंज के राजद विधायक जयवर्धन यादव जदयू में आ गए हैं। 2010 में यह सीट भाजपा के खाते में थी। ऊषा विद्यार्थी विधायक बनीं। 2015 में वह हार गईं। गायघाट पर जदयू का दावा व्यवहारिक है। पहली बार 2000 में जदयू की जीत हुई थी। 2005 में भी जदयू के उम्मीदवार थे। 2010 में सीट भाजपा के खाते में गई। जदयू ने सीट के साथ उम्मीदवार भी दिया। वीणा देवी चुनाव जीत गईं। 2015 में भाजपा उम्मीदवार की हैसियत से वीणा देवी महज चार हजार वोटों के अंतर से हारी। वह अभी वैशाली से लोजपा की सांसद हैं। जदयू कह सकता है कि भाजपा हमारी सीट लौटा दे। गायघाट के राजद विधायक महेश्वर यादव जदयू में हैं। उनकी उम्मीदवारी पर विवाद की गुंजाइश नहीं है।

परसा के राजद विधायक चंद्रिका राय के जदयू में शामिल होने पर भाजपा को परेशानी नहीं हो सकती है। यह कभी भाजपा की सीट नहीं रही है। 2015 में एनडीए की ओर से लोजपा के उम्मीदवार छोटे लाल राय थे। वे 44 हजार वोटों के अंतर से हारे थे। 2005 के दोनों चुनावों में यही छोटेलाल राय जदयू उम्मीदवार की हैसियत से जीते थे। अब राजद के उम्मीदवार होंगे। पातेपुर में 2010 में भाजपा के महेंद्र बैठा जीते थे। यह इस सीट पर भाजपा की पहली और आखिरी जीत थी। बैठा भी भाजपा के पुराने जुड़े नहीं है। वे भाजपा से पहले लोजपा और जनता दल से चुनाव जीत चुके थे। 2015 में जदयू की मदद से राजद उम्मीदवार प्रेमा चौधरी की जीत हुई थी। प्रेमा अब जदयू में हैं। संभव है कि भाजपा पातेपुर पर अपना दावा न करे।



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