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PATNA : विधानसभा चुनाव का अंतिम पायदान सीएम की ताजपोशी ही होती है. कई बाद दल या गठबंधन पहले से सीएम उम्मीदवारों के नाम सामने रख मैदान में आते हैं, जबकि कई बार चुनाव परिणाम आने के बाद सीएम तय किये जाने की बात होती है. पिछले दो चुनावों की बात करें तो 2010 में एनडीए की तरफ से सीधे नीतीश कुमार उम्मीदवार थे, जबकि राजद समर्थित दलों ने चुनाव परिणाम बाद सीएम तय करने के मसौदे से चुनाव लड़ा था. वहीं, पिछली बार 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू व राजद के समर्थित महागठबंधन की ओर से भी नीतीश कुमार का चेहरा सीएम के लिए सामने रखा गया था, जबकि भाजपा ने पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ और चुनाव परिणाम आने के बाद सीएम तय करने की बात कही थी. कुल मिलाकर दोनों बार सीएम नीतीश कुमार के सामने कोई नहीं था, पर इस बार छह उम्मीदवार सीएम पद की दावेदारी के साथ चुनाव मैदान में हैं.

महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी ही सीएम का चेहरा हैं. तीसरे नंबर पर लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान सीएम पद के उम्मीदवार हैं, हालांकि, चिराग पासवान भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनाने की बात कर रहे हैं. वहीं, ग्रैंड डेमोक्रेडिट सेक्यूलर फ्रंट की ओर से पूर्व मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा को सीएम पद का उम्मीदवार हैं. पांच बार सांसद रहे पप्पू यादव पीडीए गठबंधन के सीएम उम्मीदवार हैं. वहीं, अखबारों में सीधे सीएम पद के उम्मीदवार का विज्ञापन देकर आयी पुष्पम प्रिया चौधरी प्लुरल्स पार्टी की ओर से सीएम की उम्मीदवार बनी हैं.

आजादी के बाद लगभग 1990 तक सत्ता में आती जाती रही कांग्रेस अब बिहार की राजनीति में बैकफुट प्लेयर रह गयी है. वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के डाॅ श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बने थे. इसके बाद अब तक 18 मुख्यमंत्री कांग्रेस के खाते में रहे हैं. वहीं, 1990 के बाद बिहार में मजबूत हुई भाजपा का आज तक कोई मुख्यमंत्री नहीं बना है. सबसे बड़ी बात है कि भाजपा जब भी अकेली लड़ी हो, तो भी चुनाव से पहले कभी भी सीएम पद के उम्मीदवार को लेकर कोई चेहरा सामने नहीं रखा. वर्ष 1995 के विधानसभा चुनाव में लालू को टक्कर देने के लिए समता पार्टी से नीतीश कुमार चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन लालू की ही जीत हुई. वर्ष 2000 में राबड़ी और नीतीश कुमार में मुकाबला रहा. 2005 के चुनाव में भाजपा व जदयू ने मिल कर नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ा. उस समय ही बीजेपी की ओर से तय कर दिया गया था कि जदयू व भाजपा के गठबंधन में नीतीश कुमार ही सीएम होंगे. वहीं ,राजद की ओर से राबड़ी देवी ही सीएम की उम्मीदवार थीं, लेकिन राजद ने चुनाव से पहले इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की थी.

बिहार की पहली विधानसभा चुनाव 1952 और 1957 के चुनाव में श्रीबाबू यानी श्रीकृष्ण सिंह ही कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरा थे. कांग्रेस की जीत के बाद 1961 तक वे बिहार के सीएम रहे. वर्ष 1962 के चुनाव में कांग्रेस में श्रीबाबू व अनुग्रह नारायण सिंह का दौर समाप्त हो चुका था. चुनाव से पहले कांग्रेस की ओर से सीएम उम्मीदवार का कोई घोषित चेहरा नहीं था. दीप नारायण 18 दिन के लिए सीएम बने थे. इसके साथ ही बिहार की राजनीति में अनिश्चितताओं का दौर शुरू हो गया. विनोदानंद झा, केबी सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री से लेकर अधिकतर सीएम पांच वर्षों के कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये.



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