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  • दुनिया के टीबी के मरीजों का एक-चौथाई भारत में, देश में 1 लाख लोगों पर 219 टीबी मरीज
  • 90% गर्भवती महिलाओं की पेशकश से पहले केवल एक बार जांच होती है

दैनिक भास्कर

Jul 10, 2020, 09:23 AM IST

नई दिल्ली। भारत में 8 लाख कोरोना केस होने वाले हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और दिल्ली में संभावितों का आंकड़ा एक लाख से बहुत अधिक हो गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री को यह कहना है कि जिन कोरोनाटेन्स की स्थिति ज्यादा गंभीर नहीं है, उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोगों को घर पर ही इलाज मुहैया कराया जाएगा। ये कथन भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की हालत बताने के लिए काफी है।

इस रिपोर्ट में हम आपको भारत से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति, देश के हर नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए हमारी ज़रूरत क्या है?, बीमारियों की रोकथाम हमारे प्रदर्शन में के बारे में बताएंगे।

रूरल हेल्थ सिस्टम रल०% सुधार के बाद भी २०% से कम लोगों को मिल रही है
केंद्र सरकार की ओर से जारी होने वाला राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ड्रास्टर्स पिछली बार 2015 में आया था। इसके अनुसार पांच साल में हमने अपनी ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधा को 80% ज्यादा मजबूत किया। लेकिन इतना करने के बाद भी हम 20% से कम लोगों की स्वास्थ्य सुविधा को ही कवर कर पा रहे हैं। ड्राफ्ट के मुताबिक, एनआरएचएम के पूरे ढांचे को दुरुस्त करने के लिए केंद्र सरकार से जितने बजट की जरूरत थी, केंद्र सरकार ने उसका 40% खर्च किया।

भारत में 39.1% नॉन-कम्युनिकेशंसबल और 24.4% कम्युनिकेशंसबल डिजीज
हमारे देश में नॉन-कम्युनिकेशंस डिजीज यानी ऐसी बीमारियां जो एक से दूसरे को हो सकती हैं, कुल बीमारियों में 39%% हैं। संचार योग्य डिजीज की दर 24.4% है। मेंटल और नॉन-इनटल बीमारियों की दर 13.8% है। ड्राफ्ट में सरकार ने माना है कि राष्ट्रीय स्तर पर नॉन-कम्युनिकेशंसबल बीमारियों के रोकथाम के लिए हमारी व्यवस्था बहुत कम है।

पढ़ाई के टीबी के मरीजों का एक-चौथाई भारत में
2001 में देश की कुल बीमारियों में HIV (HIV) का औसत 0.41% था, 2011 में ये घटकर 0.27% हो गया। इसके बावजूद 2011 में एचआईवी के 21 लाख मामले थे। ये 1.48 लाख नए मामले 2011 में आए। भारत में 1 लाख लोगों पर 219 लोगों को टीबी है। एक लाख लोगों में 19 की मौत टीबी के कारण होती है। बुकिंग में टीबी के 24% मरीज भारत से होते हैं।

90% गर्भवती महिलाओं की पेशकश से पहले केवल एक बार जांच होती है
डब्ल्यूएचओ कहता है, सभी गर्भवती महिलाओं के लिए अधिसूचना से पहले कम-से-कम तीन बार जांच जरूरी है। लेकिन, भारत में 2015 तक 90% गर्भवती महिलाओं की पेशकश से पहले केवल एक जांच हो पाती थी। 13% को टिटनेस का केक भी नहीं मिलता है। 79% को आवश्यक एएफए एमबी नहीं मिलता है। 12 से 33 महीने के बच्चों में से 39% का पूरा टीकाकरण नहीं हो पाता है। जर्नल ऑफ कम्युनिटी हेल्थ के मुताबिक, अभी भी गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों की देखने-रेख में पिछले 15 सालों से बड़े बदलाव नहीं आए हैं।

स्वास्थ्य के रूप में खर्च करना आवश्यक है हम उसका आधा भी नहीं करते हैं
नेशनल हेल्थ अकाउंट एस्टीमेट 2015-16 के मुताबिक, भारत की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकारीकरण स्वास्थ्य एक्सपेंडिचर (GHE) 1,62,863 करोड़ है, जो कि जरूरी खर्च का महज 30% है। पिछले 15 साल से हम इतना ही खर्च करते आए हैं। 2004 में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने का वादा किया।

सरकार ने पांच साल में इसे जीडीपी का 2-3% करने का दावा किया लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2017 में एक बार फिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में सरकार ने 2025 तक वह स्वास्थ्य पर हो खर्चे को जीडीपी 2.5% करने की बात कही है। लेकिन, पिछले 15 साल से भारत पब्लिक हेल्थ पर अपने जीडीपी का औसतन 1% खर्च कर रहा है।

ये हर नागरिक पर स्वास्थ्य पर किए जाने वाले खर्च के हिसाब से श्रीलंका और इंडोनेशिया से बहुत कम है। भारत दुनिया के उन देशों में से एक है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करते हैं।

स्रोत – नेशनल हेल्थ पॉलिसी ड्राफ्ट 2015

WHO की हेल्थ फाइनेंसिंग प्रोफाइल 2017 के मुताबिक, भारत के लोग अपने कुल खर्च का दो-तिहाई हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। दुनिया के लोगों का औसत 18.2% है। 63% भारतीय हर साल इसके कारण गरीबी का सामना करते हैं। विश्व बैंक के मुताबिक, भारत के अस्पतालों में 1429 लोगों पर एक बिस्तर, देश में 1167 लोगों के लिए एक डॉ। है? भारत में हर चार में एक आदमी पर नॉन-कम्युनिकेशंसबल डिजीज से मरने का खतरा रहता है।

(यह रिपोर्ट नेशनल हेल्थ पॉलिसी ड्राफ्ट 2015, नेशनल हेल्थ अकाउंट 2015-16, नेशनल हेल्थ पॉलिसी 2017, वर्ल्ड हेल्थ यूनियनटन के हेल्थ फाइनेंसिंग प्रोफाइल 2017 और वर्ल्ड बैंक के फाइंडिंग के आधार पर तैयार की गई है।)





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