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” राष्ट्र रक्षा समं पुण्यं, राष्ट्र रक्षा समं व्रतम्, राष्ट्र रक्षा समं यज्ञो, दृष्टो विश्वास च आत्म च। ” यानी राष्ट्र रक्षा के समान कोई पुण्य नहीं, राष्ट्र रक्षा के समान कोई व्रत नहीं, राष्ट्र रक्षा के समान कोई यज्ञ नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ इस तरह से राष्ट्र रक्षा के प्रण के साथ बाहुबली का स्वागत किया। राफेल का मतलब होता है हवा का तेज झोंका। भारत इस हवा के झोंके को महसूस कर रहा है। राफेल फ्रेंच भाषा का शब्द इसका शाब्दिक अर्थ है तो हमने आपको बताया। लेकिन चीन के लिए और वहां के राष्ट्रपति के लिए इसका अर्थ है मुसीबत का तेज झोंका और पाकिस्तान व उसके कप्तान इमरान खान के लिए इसका अर्थ है डर का तेज झोंका। राफेल ने एक लंबी यात्रा तय की है, न सिर्फ फ्रांस से भारत तक की अपितु ये यात्रा दो दशकों की है। जब भारत ने पहला पुरस्कार जीता था एमएमआरसीए यानी मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट का सपना देखा था। राफेल के भारत आने के मायने क्या हैं? राफेल का आना इतना विशेष क्यों है? ऐसे कई सारे सवालों से जुड़ी कई रिपोर्ट आपने पढ़ी और देखी होंगी। लेकिन इन सब के बीच राफेल देश के अंदर भी राजनीतिक लड़ाई से दो-चार हुआ है और आरोपों ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दी है। आइए आपको राफेल की राजनीतित च क उड़ान से आरोपों के इम्तिहान को लेकर कर हिन्दुस्तान की सरजमीं पर कदम रखने की कहानी बताते हैं।
राहुल द्वारा राफेल को भाजपा का बोफोर्स बनाने की कोशिश
गली-गली में शोर है … भीड़ से आवाज आती है “चौकीदार ठाठ है“सफेद कुर्ते और जीन्स में अलग-अलग भाव-भंगिमा के साथ तीखे तेवर और चुटी अंदाज़ में कांग्रेस अध्यक्ष और देश के 50 वर्षीय ऊर्जावन युवा नेता राहुल गांधी पूरे चुनाव, रैली दर रैली रोड शो दर रोड शो एक सूत्री कार्यक्रम पर चले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला। वे उनका मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें नाकाम बताते हैं, भ्रष्टाचारी बताते हैं और देश को उनसे मुक्ति दिलाने की बात करते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने पूरे चुनाव में मोदी सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों के चौकिदार है, राफेल डील में गड़बड़ी हुई है। भ्रष्टाचार हुआ है जैसे आरोप लगाते-लगाते राहुल गांधी ने इसमें सुप्रीम कोर्ट को भी घसीटते हुए कहा की कोर्ट ने भी कह दिया चौकीदार थो है। रूपान मामला न्यायालय की अवमानना ​​का बना और फिर राहुल कोर्ट से कहते दिखे ‘हमें भूल गए हमको माफी दो दो’। लेकिन जो राफेल के बहाने राहुल राजनीतिक उड़ान भर रहे थे और दो साल से अपनी राजनीति के पैंतरे तय किए, पीएम को झूठा, फरेबी और बेइमान देने से भी नहीं चूके, बोफोर्स के समानांतर राफेल लाने की कवायद करते रहे लेकिन उसके धरातल पर आम जनता की नजर में असर कुछ खास नहीं दिखा। साल 2019 में भारत टुडे-एक्सिस के आये डेवलपर में पाया गया कि देश के ग्रामीण इलाकों में ज्यादा लोग राफेल के बारे में नहीं जानते थे। इस सर्वे में यह दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में केवल 21 प्रतिशत लोग जानते हैं कि राफेल क्या है।

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सुप्रीम कोर्ट ने जांच की याचिका को खारिज कर दिया

सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को जांच की जांच की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि राफेल की खरीद में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। अदालत ने पिछले साल नवंबर में अपने फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाओं को खारिज करते हुए प्रस्तुत करने को लेकर राजनीतिक विवाद पर विराम देते हुए कहा था।

परिकर की भूमिका
इस सौदे को लेकर देश में जमकर राजनीति हुई। हालाँकि, इस सबके बीच एक नाम दिव्य रक्षा मंत्री का है मनोहर पर्रिकर भूमिका जिसने इस भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यहां तक ​​कि वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इसी वर्ष अप्रेल में पर्रिकर को याद करते हुए कहा था कि उन्हीं इस सौदे को फिर से जिंदा कर मुकाम पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनाथ सिंह ने यह बात पर्रिकर की प्रार्थना सभा में कही थी। ध्यान रहे कि 23 सितंबर, 2016 को निहितौर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने नई दिल्ली में फ्रांस के तत्कालीन रक्षा मंत्री के साथ 36 राफेल युद्धक विमानों के परीक्षण पर डील की थी। दसॉ एविएशन की रफाल के लिए लगभग 59 हजार करोड़ रुपये की डील हुई थी। गौरतलब है कि राहुल गांधी ने दावा किया था कि पर्रिकर ने उनसे कहा था (बतौर रक्षा मंत्री) उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल लड़ाकू जेट में किए गए बदलावों के प्रति अंधेरे में रखा। पर्रिकर ने राहुल गांधी के दावे से यह कहते हुए इनकार किया था कि कांग्रेस नेता को पांच मिनट के शिष्टाचार भेंट को राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
राफेल पर सरकार के संकटमोचक
एक और शख्स जिन्होंने राफेल पर कांग्रेस के आरोपों की उड़ान को जमींदोज करने में प्रखरता दिखाई तो वो आज हमारे बीच मौजूद नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के संकट मोचक रहे अरुण जेटली। एक वक्त था जब राहुल गांधी ने संसद में राफेल डील का मुद्दा उठाया मसला डिफेंस से जुड़ा था। कायदे से तो सवालों का जवाब तत्तकालीन रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को देना था। सरकार की तरफ से तमकों और सवालों की ढाल-प्रतिभा के बारे में अरुण जेटली खड़े हुए तो मामला आमने-सामने का हो सकता है। दोनों पक्षों में तीखी बहस चली और इस दौरान कांग्रेस के सांसद पत्रों के जहाज उड़ाते रहे, जिस पर उस वक्त की स्पीकर सुमित्रा महाजन ने प्रकरण आपत्ति जताई। राहुल के सवालों और अरुण जेटली के जवाबों में कितनी सही-गलत रही, यह अलग बहस का विषय है, लेकिन जेटली ने एक हद तक राहुल गांधी के तीखे सवालों से सरकार को बचाने की प्रभावी कोशिश की। इसके अलावा जैसा का राष्ट्रपति कांफ्रेंस उन्होंने की, जब तक उन्होंने ब्लॉग लिखकर राफेल को लेकर सरकार की तरफ से पक्ष रखा, जैसा रक्षामंक्षी निर्मता सीतारमण ने भी नहीं किया।

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फ्रांस से डिजाइन किया गया राफेल वो लड़ाकू विमान जिसको लेकर देश के भीतर जोरदार सियासत हुई। वह सियासत तब भी जारी है जब राफेल हिन्दुस्तान का हिस्सा हो गया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह व्यंगात्मक तरीके से ट्वीट कर राफेल की कीमत बताने की मांग कर रहे हैं। रणदीप सुरजेवाला ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कई सवाल दाग दिए। हालांकि, राफेल पर सियासत अपनी जगह है लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि हथियारों और तकनीक से लैस राफेल दुश्मनों का कायर साबित नहीं होगा। विमानों के जमीन पर उतरने को टेककि भाषा में टच डाउन कहते हैं। दहाड़ता हुआ, गरजता हुआ और दुश्मनों को मुंह चिढ़ाता हुआ राफेल हिन्दुस्तान की धरती पर टच डाउन हो गया है।]





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