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  • सोमवार को पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक होगी, जिसमें ओली की किस्मत पर फैसला होगा
  • कमेटी की बुधवार को हुई बैठक में 44 में से 33 सदस्यों ने ओली के इस्तीफे की मांग की थी

अनिल गिरी, काठमांडू से

जुलाई 04, 2020, 10:32 PM IST

प्रधानमंत्री पद की कुर्सी बचाने के लिए जूझ रहे केपी शर्मा ओली शनिवार शाम राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से मिलने पहुंचे। नेपाल के राष्ट्रपति कार्यालय ने भंडारी और ओली के बीच बैठक की जानकारी दी। हालांकि, बैठक को लेकर कोई भी बयान देने से इनकार कर दिया गया है। वहीं, ओली ने शनिवार रात एक आपातकालीन काउंटर बैठक भी बुलाई। शादी की बैठक के बाद ओली कुछ घोषणा कर सकते हैं।

ओली ने खुद को सबकुछ समझने की भूल की
प्रधानमंत्री ओली पर प्रधानमंत्री पद और पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने का दबाव बन रहा है। देश की सबसे ताकतवर सरकार का संचालन करने के बाद वह खुद को ही सबकुछ मानने लगे थे। इससे पार्टी के दूसरे लोगों को चिंता होने लगी थी।

ओली ने खुद को भाग के कुछ मेंबरों और सलाहकारों से घेर रखा है। उन्होंने पार्टी सचिवालय को भी दरकिनार करना शुरू कर दिया, जो कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) की एक निर्णायक पार्टी है। इसमें पार्ट के 9 बड़े नेता शामिल हैं।

दहल सहित बड़े लोगों को नजरअंदाज करना मंहगा पड़ा
पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ जिन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक अपनी माओवादी पार्टी चलाई, उन्हें भी दरकिनार कर दिया। पार्टी के सह-अध्यक्ष होने के बावजूद उनकी बात पर शायद कभी अमल हुआ। उनके लिए यह अनुभव नया और सामान्य करने वाला था। इसके साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ खनल को भी साइडलाइन कर दिया गया। दोनों ही नेता कम्युनिस्ट पार्टी की कमान संभाल चुके हैं।

पार्टी में धीरे-धीरे ओली का कद बी
धीरे-धीरे ओली का कद पार्टी के अंदर घटता चला गया और उनके कई नेता उनके विरोध में आ गए। मई में ओली और दहल एक समझौते पर पहुंचे कि ओली पूरे पांच साल तक सरकार चलाएंगे, जबकि दहल अधिक जिम्मेदारी के साथ पार्टी में कार्यकारी अध्यक्ष बनेंगे। हालांकि, ओली यह करने में भी फेल रहा। पार्टी के आंतरिक सूत्रों के मुताबिक ओली ने खुद को वरिष्ठ नेता बताते हुए सरकार और पार्टी दोनों पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहा है।

ओली सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे
ओली की सरकार भ्रस्टाचार और अनियमितता करने के भी आरोप लगे। विदेश नीति को लेकर भी उन्हें घेरा गया। विशेष रूप से भारत के साथ बिगड़ते संबंध पर उनकी छवि और खराब हुई। कोरोनावायरस के समय ओली सरकार पर चीन से चिकित्सा आपूर्ति की खरीद में भी गड़बड़ी करने के आरोप लगे।

अध्यादेश पेश करने पर विवाद बढ़ा
ओली ने अप्रैल में दो विवादित अध्यादेश पेश किए थे। इसके बाद सत्ता पक्ष के भीतर विवाद बढ़ गया। ये अध्यादेश के माध्यम से वह अपने अधिकार बढ़ाना चाहते थे। हालांकि, विवाद बढ़ने पर उन्होंने अध्यादेश वापस ले लिया। लेकिन, तब तक पार्टी के कई नेता उनसे काफी नाराज हो चुके थे। स्टैंडिंग कमेटी के 20 मेंबरों ने इस तरह के विवादों को दूर करने के लिए बैठक की मांग की। लेकिन, ओली ने इसे भी नहीं दिया है।

भारत के साथ सीमा विवाद ओली के लिए वरदान बना
मई की शुरुआत में भारत के साथ सीमा विवाद ओली के लिए वरदान बन गया। उन्होंने तुरंत एक कट्ठा राष्ट्रवादी रुख अपनाया। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष में सभी को प्रधानमंत्री के साथ उठाया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं करने पर उन्हें ‘राष्ट्रद्रोही’ करार दिया जाता है। लेकिन, जब नक्शे को संविधान में शामिल किया गया। इसके बाद फिर से पार्टी नेताओं ने स्टैंडिंग कमेटी की बैठक की मांग की। हालाँकि, इस बार ओली के पास इसे टालने का कोई बहाना नहीं था।

भारत पर षड़यंत्र रचने का भी आरोप लगाया गया
ओली ने भारत और अपनी पार्टी के कुछ नेताओं पर उन्हें पद से हटाने और उनकी बात न सुनी जाने का आरोप लगाया। इसी सप्ताह स्टैंडिंग कमेटी की बैठक हुई, जिसमें दहल, नेपाल, खनल, गौतम और 11 अन्य सदस्यों ने ओली को पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए कहा। इस दौरान दहल ने कहा, “यह भारत नहीं मैं हूं, जो आपकी किरण की मांग कर रहा हूं।”

संसद सत्र भी संपन्न
ओली ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए मंगलवार को राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के साथ बैठक की और संसद सत्र स्थगित करवा दिया। शुक्रवार को तनाव कम करने के लिए ओली और दहल की एक बैठक बुलाई गई थी, लेकिन उसके भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिले। शुक्रवार को तीन घंटे चली बैठक में ओली ने साफ किया कि वह प्रधानमंत्री पद और पार्ट के अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं देंगे। अब फिर से सोमवार को पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक होगी।





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