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  • तमाम विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं कि विकास दुबे कई नेताओं का पर्दाफाश कर सकता था, इसलिए उसे गिराया गया
  • पुलिस की कहानी अपनी जगह है, वहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं कि प्रक्रिया के तहत केस तो हत्या का ही दर्ज होगा

दैनिक भास्कर

Jul 10, 2020, 06:30 PM IST

नई दिल्ली। कानपुर के सलारू गांव में सीओ सहित 8 पुलिसवालों की हत्या करने वाला खाईंगस्टर विकास दुबे शुक्रवार सुबह एनकाउंटर में मारा गया। एनकाउंटर में मारे गए पुलिसकर्मियों के परिजन के साथ ही आम जनता इसे जायज रोक रही है। दूसरी ओर, सियासत भी गरमा गई है।

तमाम विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं कि विकास दुबे कई नेताओं का पर्दाफाश कर सकता था, इसलिए उसे गिराया। एनकाउंटर के तौर-तरीकों पर भी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। पुलिस की कहानी अपनी जगह है, वहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं कि प्रक्रिया के तहत केस तो हत्या का ही दर्ज होगा।

विकास दुबे के एनकाउंटर में पुलिस की कहानी क्या है?
यूपी एसटीएफ की टीम विकास दुबे कोजैन से कानपुर ले जा रही थी। शहर से 17 किमी पहले बर्रा थाना क्षेत्र में सुबह 6:30 बजे काफिले की एक कार पलट गई। विकास दुबे उसी गाड़ी में था। गैंगस्टर विकास दुबे ने पुलिस से पिस्टल छीनकर हमला करने की कोशिश की। जवाबी कार्रवाई में उसे तीन गोलियां लगी और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई।

सुबह 7 बजकर 55 मिनट पर मृत घोषित कर दिया गया। विकास दुबे को तीन गोली छाती में और एक बांह में लगी। एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार का कहना है कि गाड़ी पलटने के बाद विकास ने दौड़ की कोशिश की। उसने एक घायल जवान की पिस्टल छीनी थी। हमने विकास से सरेंडर के लिए कहा, लेकिन उन्होंने फायरिंग कर दी। पुलिस को बचाव में उस पर गोली चलानी पड़ी।

अब आगे क्या होगा, पुलिस ने जो किया वह सही है?
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय पारिख का कहना है कि कानून में एनकाउंटर जैसा कोई शब्द नहीं है। कानूनन यह एक हत्या है। एफआईआर होगा। लोगों को गलतफहमी है कि पुलिस एनकाउंटर कर बच जाती है। ऐसे दसियों मामले हैं जहां फेक एनकाउंटर में पुलिसकर्मियों को सजा मिली है। पुलिस को एनकाउंटर में किसी को मार देने की छूट नहीं है। यह भी हत्या की तरह ही ट्रीट किया जाता है।

केस दर्ज होगा और स्वतंत्र पुलिस अधिकारी जांच करेंगे। जांच में ही यह स्पष्ट होगा कि पुलिसकर्मियों ने आत्मरक्षा के अधिकार के तहत अपराधी पर गोली चलाई है या फेक एनकाउंटर किया है। वर्तमान में इस मामले में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। एनकाउंटर हुआ है, सही है या फेक, जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

राइट फॉर प्राइवेट डिफेंस यानी आत्मरक्षा के अधिकार के तहत उन्हें अपनी कार्रवाई को जायज ठहराना होगा। इसके अलावा, विकास दुबे का कोई रिश्तेदार किसी थाने में हत्या की एफआईआर दर्ज करवा सकता है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट में एनकाउंटर केस लड़ने वाले वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया कि यह एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग का एक स्पष्ट केस है। दुबे एक गैंगस्टर आतंकी था, जिसे शायद मरना ही चाहिए था। लेकिन यूपी पुलिस ने स्पष्ट तौर पर उसकी हत्या की है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस अपराध पर नोटिस नहीं लेता है, तो इसका मतलब यह होगा कि भारत में कानून का शासन बचा ही नहीं है।

क्या है प्राइम फ़ॉर डिफेंस?
आईपीसी के सेक्षन 96 से 106 तक रेस्ट ऑफ प्राइवेट डिफेंस को परिभाषित किया गया है। इसमें व्यक्ति की सुरक्षा और अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए दिए गए अधिकार शामिल हैं। इसमें भी सेक्ष 100 में स्पष्ट किया गया है कि किन परिस्थितियों में आत्मरक्षा के लिए की गई हत्या को अपराध नहीं माना जाता है। इसमें चार प्रावधान बताए गए हैं।

1। जिस व्यक्ति ने हत्या की है, मुठभेड़ में उसकी कोई गलती नहीं होनी चाहिए।
2। यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि वह हत्या नहीं करता तो उसकी जान को खतरा या शरीर को गंभीर चोट पहुंच सकती थी।
3। आरोपी के पास पीछे हटने या दौड़ का कोई रास्ता नहीं था।
4। सामने वाले को जान से मारना उस वक्त की आवश्यकता थी।

तो क्या पुलिस आत्महत्या को आधार बनाकर बच निकलेगी?
यह इतना आसान नहीं है। एक मामले में 26 तो एक में 30 साल बाद भी आरोपी पुलिसकर्मियों को हत्या की सजा सुनाई गई है।
1। पंजाब के अमृतसर में दो पुलिसकर्मियों ने 18 सितंबर 1992 को एक 15 वर्षीय नाबालिग का एनकाउंटर कर दिया था। जांच की गई। 26 साल बाद, 2018 में दोनों पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
2। देहरादून में 3 जुलाई 2009 को रणवीर की एनकाउंटर में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी विस्तृत जांच के बाद 18 पुलिसकर्मियों को जून 2014 में उम्रकैद की सजा दी गई। बाद में, 11 रिहा हो गए, जबकि सात की सजा कायम है।
3। जुलाई 1991 में पीलीभीत में 47 पुलिसकर्मियों ने 11 सिखों को आतंकी बताकर मुठभेड़ में मार गिराया था। पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। तब तक 10 की मौत हो चुकी थी।
4। दिल्ली में 1997 में दो उद्योगपतियों को मुठभेड़ में मार गिराने वाले सहायक पुलिस आयुक्त सहित दस अधिकारियों को 2011 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

एनकाउंटर हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट की 16-सूत्री गाइडलाइन क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में एनकाउंटर हत्याओं के संबंध में कहा था कि सरकार किसी भी व्यक्ति को संविधान के तहत मिले जीने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। इसके बाद उन्होंने 16-सूत्री गाइडलाइन भी जारी की थी।
1। आपराधिक गतिविधियों से जुड़ी मुखबिरी का रिकॉर्ड लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखा गया।
2। यदि किसी टिप-ऑफ पर पुलिस बंदूकें का इस्तेमाल करती है और किसी व्यक्ति की मौत होती है तो उचित आपराधिक जांच को शुरू करती हुई एफआईआर दर्ज की जाती है।
3। इस तरह की मौत के मामले की जांच स्वतंत्र रूप से टीम करेगी, जो कम से कम ई जांच इससे पहले की हो।
4। एनकाउंटर हत्याओं में धार्मिकवादी जांच अनिवार्य रूप से की जाएगी।
5। एनएचआरसी या राज्य के मानव अधिकार आयोग को एनकाउंटर में हुई मौत की जानकारी तत्काल दी जाएगी।
6। घायल होने / अपराधी को तत्काल चिकित्सीय मदद दी जाए और धार्मिकता उसका बयान दर्ज करें।
7। बिना किसी देरी के एफआईआर और पुलिस दी को कोर्ट भेजना सुनिश्चित करें।
8। तत्काल ट्रायल शुरू करें और उचित प्रक्रिया का पालन करें।
9। कथित अपराधी के नजदीकी रिश्तेदार को मौत की सूचना दें।
10। सभी एनकाउंटर मौतों का ब्योरा दो साल में एनएचआरसी और राज्य आयोगों को निर्धारित फॉर्मेट में निर्दिष्ट किया जाना चाहिए।
1 1। यदि कोई एनकाउंटर गलत तरीके से किया जाता है तो दोषी पुलिस अधिकारी को निलंबित कर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
12। सीआरपीसी के तहत मृतक के राहत को मुआवजा दिया जाएगा।
13। पुलिस अधिकारियों को कॉन्स्ट के आर्टिकल 20 के तहत मिले अधिकारों के संबंध में जांच के लिए अपने हथियार तत्काल सरेंडर करने होंगे।
14। आरोपी पुलिस अधिकारी के परिवार को तत्काल सूचना दी गई और उन्हें वकील / सलाहकार की सेवाएं दी जाए।
15। एनकाउंटर हत्या में शामिल अधिकारियों को कोई आउट ऑफ टर्न पुरस्कार या प्रमोशन नहीं दिया जाना चाहिए।
16। पीड़ित के परिवार को अगर लगता है कि गाइडलाइंस को फॉलो नहीं किया गया है तो वह जजों को शिकायत कर सकती है। जज संज्ञा लेगा।





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