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बिहार चुनाव 2020 के लिए नामांकन की शुरुआत हो चुकी है. प्रथम चरण की अधिसूचना 1 अक्टूबर को जारी कर दी गई. इस चरण के सीटों के लिए 8 अक्टूबर नामांकन के लिए आखिरी तारीख है. लेकिन नामांकन की शुरुआत होने के बावजूद भी बिहार के दोनों प्रमुख गठबंधन, यूपीए (महागठबंधन) और एनडीए में सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया था. लेकिन चुनाव नजदीक आते ही सरगर्मियां बढ़ी और पलभर में सबकुछ तय हो गया.

सीट शेयरिंग के मसले पर तेजस्वी ने मारी बाजी

2020 के विधानसभा चुनाव में एक नया समीकरण बिहार में देखने को मिल रहा है. यह समीकरण कुछ तो 2010 की याद दिलाती है तो कुछ 2005 और उससे पहले की. बहरहाल सीट शेयरिंग के मसले पर महागठबंधन ने बाजी मार ली है. तीन अक्टूबर को पटना में महागठबंधन ने अपना फॉर्मूला साझा कर दिया.

सीटों का बंटवारा इस बार न तो महागठबंधन के लिए और न ही एनडीए के लिए आसान रहा. लेकिन, तेजस्वी यादव ने कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए बढ़त बना लिया है. इसका प्रभाव ये हुआ कि अगले दिन 4 अक्टूबर को एनडीए ने भी अपना फॉर्मूला साझा कर दिया.

महागठबंधन के तय फॉर्मूले के तहत, आरजेडी 144, कांग्रेस 70 और वामदल 29 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वामदलों में सबसे अधिक सीटें सीपीआई (एमएल)/ (माले) को दी गई है. माले को 19, सीपीआई को 6 और सी.पी.एम. को 4 सीटें दी गई है.

वहीं, एनडीए में ठीक सीट बंटवारे के दिन दोफाड़ हो गया. एलजेपी नेता चिराग पासवान ने मन मुताबिक़ सीटें न मिलने पर अलग होने का फैसला ले लिया. इसके बाद बीजेपी, जेडीयू और हम ने अपना फॉर्मूला तय कर लिया है. तय फॉर्मूले के तहत जेडीयू और बीजेपी एक समान 119-119 सीटों पर लड़ेगी. वहीं, जीतनराम मांझी को महज पांच सीटें मिली हैं।

बिहार चुनाव 2020 का नया समीकरण

बिहार चुनाव 2020 तेजस्वी यादव बनाम नीतीश कुमार होना तय हो गया है. तेजस्वी यादव के लिए अपनी पार्टी आरजेडी को पुराने रुतबे में लौटाने की चुनौती है. वहीं, नीतीश कुमार अपने चौथे टर्म के लिए जनता के बीच जा रहे है.

इस चुनाव से पहले ही कई रिकॉर्ड बन चुके है. इनमें महागठबंधन का सीट शेयरिंग फॉर्मूला सबसे अहम है. 2005 के बाद गठबंधन के तहत कांग्रेस को सबसे अधिक सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिला है. अक्टूबर 2005 में कांग्रेस 51 सीटों पर मैदान में थी. इसके बाद 2010 के चुनाव में पार्टी ने अकेले चुनावी मैदान में जाने का निर्णय लिया था. 2015 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस ने फिर से आरजेडी के साथ लड़ने का फैसला किया. इस बार कांग्रेस को 41 सीटे प्राप्त हुई थी.

हालाँकि 2020 के चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित रूप से 70 सीटें दी गई है. इसके पीछे वीआईपी, हम और रालोसपा जैसे जनाधार विहीन पार्टियों का अलग होना एक प्रमुख कारण बताया जाता है. साथ ही माले को 19 सीटें दिए जाने को लेकर कई लोगों को आशंका है. लेकिन बिहार के चुनावी इतिहास में माले एक मात्र पार्टी रही है; जो कम संसाधन होने के बावजूद अप्रत्याशित रूप से जीतते आई है. माले के 2005 के बाद के इतिहास पर गौर करें तो वह अपना कैडर वोटबैंक को बचाए हुए नजर आती है.

वाम-राजनीति और माले की खासियत

माले का बिहार में करीब 5 फीसदी वोट शेयर माना जाता है. वर्ष 2005 में माले ने 85 सीटों पर चुनाव लड़ा था. पार्टी को 2.37 फीसदी मत प्राप्त हुए थे. इस हिसाब से देखे तो पार्टी के 243 सीटों पर लड़ने की स्थिति में पार्टी को साढ़े 6 फीसदी से अधिक मत प्राप्त होता जान पड़ता है.

2010 के चुनाव में माले ने 104 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारे थे. इस बार पार्टी को इन सीटों पर डाले गए कुल मतों का 4.17 प्राप्त हुआ. वहीं, पुरे बिहार की बात करें तो पार्टी को कुल मतों का 1.79 प्राप्त हुआ. हालाँकि इस बार पार्टी अपना खाता नहीं खोल पाई और इसका स्पष्ट प्रभाव मत फीसदी पर भी देखने को मिला.

लेकिन, 2015 के चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर से चौंकाया. इस बार महागठंधन की लहर होने के बावजूद पार्टी 3 सीटें जीतने में सफल रही थी. दूसरी तरफ, पीएम नरेंद्र मोदी के छतरी तले लड़ रहे एलजेपी और रालोसपा मात्र दो-दो सीटें प्राप्त करने में कामयाब हो पाए. एनडीए में शामिल हम को एक सीट प्राप्त हुआ था.

इस चुनाव में भी 98 सीटों पर डाले गए मतों का 3.82 फीसदी माले को प्राप्त हुआ था. यह 2015 के बिहार में डाले गए कुल मतों का 1.54 फीसदी है.

बिहार चुनाव में महागठबंधन और एनडीए का नया स्वरुप

वर्ष 2015 से महागठबंधन के स्वरुप में निरंतर बदलाव हो रही है. वहीं, एनडीए में भी 2010 के बाद काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. लेकिन यह एक बार फिर से 2005 पुराने स्वरुप में लौटती दिख रही है. हालाँकि इस दौरान जेडीयू से शरद यादव, उपेंद्र कुशवाहा अलग हो गए है. साथ ही नीतीश कुमार के पुराने सहयोगी रहे जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया है.

बात करें महागठबंधन की तो सबसे पहले नीतीश कुमार ने पलटी मारी. वे 2017 में अपने पुराने सहयोगी बीजेपी के खेमे में शामिल हो गए. वहीं, 2017 में एनडीए से महागठबंधन में आनेवाले और पहले जेडीयू नेता रहे जीतनराम मांझी एक बार फिर से एनडीए में शामिल हो गए है.

इसके साथ ही उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी भी महागठबंधन से अलग हो चुके है. हालाँकि, ये दल महागठबंधन के लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रहे थे. इसे देखते हुए तेजस्वी यादव ने वामदलों को साथ जोड़ लिया है. वामदल आजादी के पूर्व से ही बिहार में साम्यवादी विचारधारा का प्रचार कर रहे है. अभी तक ये देखा गया है कि वामदलों का कैडर वोट हमेशा अपने पार्टी को ही मतदान करता है. इस हिसाब से महागठबंधन इस बार लीड लेता दिख रहा है.

एलजेपी का एनडीए से अलग होना

बिहार चुनाव के बीच मझधार में चिराग पासवान ने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. अब इसके सियासी मायने भी निकाले जाने लगे है. अभी तक के जानकारी के अनुसार एलजेपी ने 143 सीटों पर लड़ने का निर्णय लिया है. वे नीतीश कुमार के खिलाफ चुनाव में जाने की बात कह चुके है.

हाल ही में एलजेपी द्वारा ये घोषणा की गई है कि वह जनता के बीच नीतीश सरकार के नाकामियों को ले जाएगी. इस फैसले से बीजेपी भी प्रभावित होगी. पिछले 15 वर्षों में बीजेपी नीतीश कुमार के साथ 10 वर्षों से अधिक समय के लिए भागीदार रही है. ख़ास बात यह है कि जुलाई 2017 से बीजेपी नीतीश कुमार के साथ है. ऐसे में एनडीए के ही सहयोगी दल द्वारा नीतीश कुमार पर हमला होने की स्थिति में विपक्ष को भी हमला करने का मौक़ा प्राप्त होगा.

इस फुट के स्पष्ट होने के बाद तेजस्वी यादव इसे हरहाल में भुनाना चाहेंगे. जिस तरह से लोजपा भ्रष्ट्राचार के मुद्दे पर बिहार की एनडीए सरकार को घेर रही है. वह एनडीए को मुश्किल में डाल सकता है.

बिहार में वीआईपी पार्टी, रालोसपा और हम जनाधार विहीन पार्टी साबित होते आई है. साथ ही, वीआईपी और रालोसपा का जो भी थोड़ा-बहुत वोटबैंक है, वही अतिपिछड़े समाज से आता है. ऐसे में चिराग के साथ ही ये सभी दल नीतीश कुमार को कमजोर करते दिख रहे है.

चुनाव परिणाम का अभी से इंतज़ार

अब ये तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चल पाएगा कि कौन कितने पानी में है. फिलहाल तेजस्वी यादव के पास सीट शेयरिंग में अपने कुशल नेतृत्व का प्रदर्शन करने के बाद, चुनाव जिताकर खुद को जनता का नेता साबित करने की चुनौती खड़ी है. उन्हें कांग्रेस के विशाल चुनावी मेकेनिज्म और वामदलों के कैडर का साथ मिला है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि उम्र और सोच के लिहाज से युवा तेजस्वी बनाम बूढ़े नीतीश में कौन बाजी मारता है.



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