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  • 1962 में दोनों देशों की इकोनॉमी में एक्सपर्ट की हिस्सेदारी जीडीपी का 4% थी, 2019 में ये हिस्सा 2% हो गया है
  • भारत की जीडीपी 2.88 ट्रिलियन डॉलर यानि करीब 215 लाख करोड़ रुपये, चीन की जीडीपी 14.34 ट्रिलियन डॉलर यानि 1072 लाख करोड़

दैनिक भास्कर

Jul 08, 2020, 05:12 PM IST

नई दिल्ली। भारत-चीन सीमा पर 22 दिन से जारी तनाव के बाद दोनों देशों की सेनाओं टकराव वाले पॉइंट से पीछे हटने को राजी हो गए हैं। हॉट स्प्रिंग और गोगरा इलाके में भी सेनाएं पीछे हट रही हैं। यह कुछ दिनों में पूरी हो जाएगी। तनाव के दौरान चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में लगातार भारत के खिलाफ लिखा गया। उसी ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया कि 1962 में भारत और चीन की अर्थव्यवस्था लगभग बराबर थी। इस समय चीन भारत के मुकाबले बहुत बड़ी इकोनॉमी है। अगर भारत और चीन के बीच युद्ध होता है तो भारत को बहुत नुकसान होगा।

आइए जानते हैं कि 1962 में कैसे दोनों देशों की आर्थिक स्थिति थी, तब से आज तक किस तरह बदली दोनों देशों की अर्थव्यवस्था की हालत है। इसके लिए हम दोनों देशों की जीडीपी, पर कैपिटा जीडीपी, एक्सपोर्ट और इंपोर्ट की जीडीपी में भागीदारी, उद्योगों का जीडीपी में योगदान, दोनों देशों की आबादी और डीफेंस बजट में आए बदलावों का विश्लेषण करेंगे।

जीडीपी: ओपन करने के बाद चीन की इकोनॉमी 39 गुना और भारत की 9 गुना बढ़ी

1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ। उस वक्त दोनों देशों की ताकत में ज्यादा फर्क नहीं था। तब चीन की जीडीपी भारत से लगभग 12% ज्यादा थी। आज दोनों देशों के जीडीपी में 5 गुना से ज्यादा का मामला हो गया है। चीन ने अपनी इकोनॉमी 1980 में ओपन की। तब से अब तक 39 साल में उसकी इकोनॉमी 75 गुना बढ़ी। वहीं, भारत ने 1991 में अपनी इकोनॉमी ओपन की। उसके बाद 28 साल में भारत की इकोनॉमी 9 गुना बढ़ी है।

2019 में भारत की इकोनॉमी में एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी चीन से 0.24% ज्यादा है

1962 में दोनों देशों की इकोनॉमी में एक्सपोर्ट की भागीदारी जीडीपी के 4% से कुछ अधिक थी। युद्ध के बाद के सालों में दोनों का एक्सपोर्ट शॉप, लेकिन 1980 के बाद चीन ने पूरी ताकत के साथ सस्ते सामान और लेबर के जरिए लाइफ के पार्किंग में अपनी पकड़ बढ़ानी शुरू की। 2010 में उनकी जीडीपी का 27% हिस्सा एक्सपोर्ट से ही आया। हालांकि, बाद के वर्षों में चीन ने बाकी सेक्टर से कमाई बढ़ाई तो एक्सपोर्ट का जीडीपी में योगदान घट गया।

भारत ने भी 1991 में जब अपनी अर्थव्यवस्था खोली तो उसकी इकोनॉमी में भी एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी बढ़ी। 2019 में भारत ने एक्सपोर्ट से जीडीपी में 18.66% जोड़ा तो वहीं चीन में 18.42% जोड़ा गया। भारत ने 2019 में चीन से 0.24% ज्यादा अपनी जीडीपी में जोड़ा लेकिन, चीन भारत से पांच गुना बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए उसका 18.42% भी हमारे 18.66% से लगभग चार गुना ज्यादा है।

चीन की तुलना में दूसरे देशों से खरीद पर भारत बहुत निर्भर करता है, लेकिन यह घटाने की कोशिश कर रहा है

1962 युद्ध के वक्त चीन की तुलना में भारत की जीडीपी में इंपोर्ट की भाग दोगुने से ज्यादा था। उस वक्त भारत की जीडीपी में इंपोर्ट का हिस्सा 6.03% था, तो चीन की जीडीपी में इंपोर्ट का हिस्सा 2.91% था। बाद के वर्षों में दोनों देशों की इकोनॉमी में इंपोर्ट की हिस्सेदारी बढ़ रही है। चीन की इकोनॉमी में अब इंोर्ट का हिस्सा 17.26% है, भारत में ये 21.36% है। यानि, भारत और चीन दोनों के दूसरे देशों से खरीद पर निर्भरता बढ़ी है। हालांकि, दोनों देशों ने पिछले 10 वर्षों में ये निर्भरता घटाई है।

ग्लोबल ट्रेड में चीन से 14.4% पीछे भारत है
दुनिया को सेवाएं और गुड्स एक्सपोर्ट के मामले में भारत से चीन आगे है। दूसरी ओर भारत के मुकाबले चीन इंपोर्ट भी काफी कम है। यह दिखाता है कि चीन की इकोनॉमी का उदय मजबूत है। भारत के मुकाबले चीन पांच गुना बड़ी इकोनॉमी है। ग्लोबल ट्रेड में में भी चीन का 18% से ज्यादा हिस्सा है, जबकि भारत का सिर्फ 2.6% है।

1962 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी चीन से ज्यादा थी, अब चीन की हमसे 5 गुना ज्यादा है

1990 तक हमारे प्रति व्यक्ति जीडीपी चीन से ज्यादा था। चीन की इकोनॉमी ओपन होने और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सख्त कदम उठाने की वजह से चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी तेजी से बढ़ी।

चीन में 29 साल के उद्योगों की हिस्सेदारी 5.47% बढ़ाई गई, भारत में 2.57% ही बढ़ी

इकोनॉमी ओपन करने के बाद चीन की जीडीपी 3200% बढ़ी
भारत से 2 साल बाद 1949 में चीन में व्यवस्था परिवर्तन हुआ। चीन का फोकस डोमेस्टिक इकोनॉमी पर था। उसने यह तय किया कि कहां पर फोरेन इन्वेस्टमेंट लाना है और कहां नहीं। उसने इकोनॉमिकल एरिया डेवलपर किया, जिसके लिए उसने चीन के दक्षिण तटीय क्षेत्रों को चुना।
चीन में आर्थिक क्रांति लाने वाले डांग श्याओपिंग ने 1978 से कम्युनिस्ट सोशलिस्ट पॉलिटिकल स्ट्रक्चर में सुधार शुरू किया और इकोनॉमी में मॉडर्नैजेशन लाए। उस समय चीन का दुनिया की अर्थव्यवस्था में हिस्सा 1.8% था। श्याओपिंग के सुधारों के बाद चीन की इकोनॉमी में बहुत बड़े बदलाव आए। इस कारण से 1980 से लेकर 2016 तक चीन की जीडीपी 3200% बढ़ी।

  • 2017 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में उसका हिस्सा 18.2% हो गया। इसी तरह चीन की मध्य से ज्यादा आबादी यानी लगभग 70 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया गया और 38.5 करोड़ लोग मिडल क्लास में शामिल हुए।
  • चीन का फॉरेन ट्रेड 17,500% बढ़ा और 2015 तक चीन फॉरेन ट्रेड में वर्ल्ड लीडर के तौर पर दिखाई दिया। 1978 में चीन ने पूरे वित्त वर्ष में जितने का ट्रेड किया था, अब 48 घंटे में कर लेता है।

वहीं, भारत ने चीन से 11 साल बाद 1991 में विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले। भारत का ग्लोबिलजेशन की तरफ बढ़ना एक फाइनेंशियल इमरजेंसी था। चीन ने अपनी इकोनॉमी में सुधार के लिए जो बदलाव किए उससे सख्ती से लागू किया गया। वहीं, लोकतांत्रिक देश भारत उदारवादी नीति के तहत आगे बढ़ा।

1962 में हमें 41% आबादी वाला देश चीन था, अब सिर्फ 4% का अंतर है

भारत का डिफेंस बजट 4.71 लाख करोड़, चीन का डिफेंस बजट हमसे चार गुना ज्यादा है
इस साल का भारत का कुल बजट 30.42 लाख करोड़ रुपये है। जबकि, चीन का 258.40 लाख करोड़ रुपए है। चीन का बजट भारत के 8 गुना से बहुत अधिक है। चीन लगातार अपना डिफेंस बजट भी बढ़ा रहा है। इस समय उसका कुल डिफेंस बजट 13.47 लाख करोड़ रुपये है। वहीं, भारत का डिफेंस बजट चीन के सिर्फ 25% यानी 4.71 लाख करोड़ रुपये है। 1962 में भारत का डिफेंस बजट कुल जीडीपी का 1.5% था। हालाँकि, अक्टूबर 1962 में चीन से युद्ध के कारण डिफेंस बजट बढ़ाकर 2.34% कर दिया गया था। 2018-19 में ये घटकर 1.49% रह गया। 56 साल में पहली बार इतनी कमी आई। 2020-21 के बजट में ये जीडीपी का 2.1% है।

ग्लोबल टाइम्स के इस दावे में कुछ नया नहीं है कि भारत चीन से छोटी इकोनॉमी है, लेकिन कानूनी शक्ति में भारत चीन से नहीं है। भारत का डिफेंस बजट चीन से कम इसलिए भी है क्योंकि चीन भारत से बड़ी इकोनॉमी है। दूसरा कारण यह भी है कि चीन एक विस्तारवादी कम्युनिस्ट साम्राज्य है और इसे बनाए रखने के लिए उसे एक एग्रेसिव आर्मी की जरूरत है, जबकि भारत एक समाजवादी लोकतंत्र है। अगर चीन के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है तो भारत भी दुनिया में तीसरे नंबर पर है। ग्लोबल टाइम्स के इस दावे में भी कोई दम नहीं है कि नुकसान सिर्फ भारत का होगा, बल्कि दो बड़ी शक्तियों के टकराव से नुकसान दोनों का होगा। चीन इस वक्त अमेरिका से ट्रेड वॉर का सामना भी कर रहा है, ऐसे में उसे निवेश के लिए भारत जैसे बड़े बाजार की जरूरत है। बॉर्डर पर चीन की तरफ से तनाव बढ़ाना भारत पर दबाव बनाने का एक तरीका था जिससे भारत अपने बाजार के दरवाजे चीन के लिए खोल दे।





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