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” क ,्करियां जिनकी सेज सुगर, छाया देती है केवल अंबर, विपदाएं दूध पिलाती है, लोरी विधियां सुनाती हैं। जो लाक्षागृह में जलते हैं, वे ही शूरमा निकलते हैं। ”
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की अमर रचना रश्मिरथी की यह पंक्तियां महाभारत के परिपेक्ष्य में थी, जिसके छंद आज के संदर्भ के अनुसार प्रासंगिक है। बिहार का चुनावी रण शुरू हो चुका है। अब इसमें जो जीतागा वही सूरमा कहलायेगा। यूं तो बिहार की भूमि का हमेशा से सियासत के नए दांव-पेज की प्रयोगशाला बनना आम रहा है, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में कर्नाटक में देखने का मिल रहा है। राष्ट्रीय सार्वजनिक गठबंधन केंद्र और प्रदेश दोनों ही जगह पर विराजमान है। इसलिए जनता से लेकर राजनीतिक और इन् ज्यादा फोकस इन्हीं के ऊपर है। तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, दावा किए जा रहे हैं और पर्दे के पीछे जाने वाले चिप-पेंच की सुगबुगाहें भी चर्चा-ए-आम बनी हुई हैं। ऐसे में समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे बिहार के सियासी रण में बीजेपी और ज़ीयू के साथ रहकर भी दूरी की बात कही जा रही है और चिराग पासवान के अलग साथ भी बीजेपी के वजीर के रूप में इस्तेमाल होने के दावे किए जा रहे हैं।

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इस पूरे खेल को समझने के लिए सबसे पहले आपको हालिया घटित कुछ चीजों के बारे में बताते हैं। चिराग का हर दिन नीतीश पर साथी रहना तो अब आम हो गया है। लेकिन ये सबमेंट सबसे दिलचस्प हैं पीएम मोदी के पोस्टर का एलजेपी के प्रयोग की बात को लेकर। बिहार की सियासत को करीब से जानने वाले एक पत्रकार के अनुसार चिराग को लेकर बीजेपी और ज़ीयू के बीच खटास यहां तक ​​पहुंच गई कि नीतीश कुमार ने एनडीए की साझा प्रेस वार्ता में जाने से इनकार तक इनकार कर दिया था और बीपीपी महासचिव भूपेंद्र यादव को दो टूक यह भी कहा कि ये सब जो रहा है वह सही नहीं है। डैमेज कंट्रोल में जुटी बीजेपी ने पहले तो प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल के माध्यम से साफ संदेश दिल से कि कोई भी दल पार्टी के किसी अन्य स्टार प्रचारक या प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर का इस्तेमाल नहीं करेगा। अगर वह ऐसा करता पाया जाता है तो पार्टी इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगी।

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इस कथन के बाद लगता है कि बिहार में नीतीश कुमार प्रोट बीजेपी के पास बहुत प्रोटेक्टिव है और उन्हें किसी भी सूरत में नाराज नहीं करना चाहता है। अब आपको इस विवरण से थोड़ा आगे के लिए हैं। नीतीश के तीर को तोड़ने के लिए चिराग हैवान ‘कमल’ के बागियों को अपने पाले में कर रहे हैं। फौरी तौर पर देखें तो आपको लगेगा कि बीजेपी से नाराज नेताओं ने लोजपा के बंगले की राह पकड़ ली है। चिराग ने 24 घंटे के अंदर बीजेपी के 3 बड़े विकेट गिराए हैं। तीनों बीजेपी के कद्दावर और पुराने नेता रहे हैं। चाहे वो संघ के कार्यकर्ता और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह हों या पूर्व विधायक रामेश्वर चौरसिया और उषा विद्यार्थी। लोजपा जवावाइन करते हुए रामेश्वर चौरसिया ने तब तक यहां कहा था कि ट्रम्प भी पीएम मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल कर रहे हैं। हम करेंगे तो क्या गुनाह है? ये सब के बीच अपने घर को उजड़ते देख भी बीजेपी खामोश है। बीजेपी खुल कर चिराग पर बोल क्यों नहीं रही है। सियासी गलियारों में यह बात किसी को ट्वीटम नहीं हो रही है।

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गांधीजी का एक सुक्ति वाक्य है ” बोलो तब जब वह मौन से बेहतर हो। ” गांधी जी के सिद्धांत का बीजेपी इन दिनों बखूबी पालन कर रहा है। चिराग को लेकर संयुक्त राष्ट्रपति कांफ्रेंस में भी किसी बीजेपी नेता ने सीधा जवाब नहीं दिया और इसको लेकर पूछे गए सवालों के 11 सवालों पर 24 बार कहा कि ” नीतीश ही हमारे नेता हैं ”। कुल मिलाकर देखें तो बीजेपी इन दिनों बिहार को लेकर एक ही काम कर रही है ” नीतीश नाम केवलम … चिराग नाम मंगलम ” क्योंकि चुनाव बाद के मठ में राजनीतिक दलों को चिराग में भाजपा के लिए मंगल ही मंगल दिखाई दे रहा है। ।
सबसे दिलचस्प है राजेंद्र सिंह का जाना
2015 में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में चर्चित रहे बीजेपी नेता राजेंद्र सिंह ने भी पाला बदलते हुए हाल ही में एनडीए से अलग हुई पार्टी लोजपा का दामन थाम लिया है। बीजेपी छोड़ लोजपा का दामन थामते प्रमुखों और इस पर बीजेपी की चुप्पी के बीच सबसे दिलचस्प है राजेंद्र सिंह की शामिल होना। पिछले चुनाव में बीजेपी की टिकट पर दारा से चुनाव लड़ने वाले राजेंद्र सिंह इस बार जदयू के मंत्री हैं जय कुमार सिंह के को टक्कर दे सकते हैं अब जिसको पता नहीं हो तो बता दें कि राजेंद्र सिंह वही चेहरा हैं जनक कि 2015 के चुनाव में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रबलता से लिया जा रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे राजेंद्र सिंह को 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में झारखंड में बीजेपी की जीत के दिग्गजकार माना जाता है। 2015 में जब राजेंद्र सिंह ने दिनारा विधानसभा सीट से पर्चा भरा था तो उनके लिए झारखंड सरकार के कई आला मंत्री मौजूद थे। उनके चुनाव प्रचार में झारखंड और यूपी के कई आला नेता शामिल थे। राजेंद्र सिंह बिहार 2015 विधानसभा चुनाव के लिए गठित अमित शाह की चार सदस्यीय टीम के सदस्य भी बने हुए हैं।
2005 में रामविलास की भूमिका में 2020 में चिराग
वर्ष 2005 का बिहार चुनाव तो सभी को याद रहेगा। जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी और रामविलास पासवान की पार्टी उस सरकार का हिस्सा थी। लेकिन बिहार चुनाव के वक्त पासवान ने चिपका खेलते हुए कह दिया था कि वह केंद्र में तो यूपीए में हैं लेकिन बिहार में लालू यादव की राजद के साथ कोई चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं करेंगे। उस समय कहा ये भी गया था कि लालू के राजद का प्रभाव कम करने के लिए रामविलास पासवान के इस खेल में कांग्रेस का हाथ था। २०२० के परिपेक्ष्य में देखें तो रामविलास की भूमिका में चिराग दिख रहे हैं।
वेट एंड वाच की स्थिति में नीतीश
बिहार के लोगों को इमोशनल पत्र लिखकर बिहारी अस्मिता की बात करने वाले नीतीश चिराग के तीखे हमलों पर रामविलास पासवान पर एहसान जताते हुए लोजपा को यह याद दिलाया कि रामविलास पासवान मनाली पहुंचे हैं, इसमें ज़ियू की भूमिका अहम रही है। नीतीश कुमार ने कहा कि एलजेपी बताए, पार्टी को बिहार विधानसभा में कई चरणों में मिली है। जब विधानसभा में उन्हें दो सीटें ही मिली हैं, ऐसे में ज़ीयू और बीजेपी ने ही रामविलास पासवान को टिकट देकर राज्यसभा पहुंचाया। कुल मिलाकर देखें तो बिहार में पूरे खेल को समझकर भी नीतीश अभी वेट और वाच की स्थिति में हैं। 15 साल के शासन के बाद फिर से सत्ता को कायम रखने की चुनौती जबकि एंटी इन्कम्बेंसी जैसी चीज भी होती है। इस सब बातों को ध्यान में रखते हुए नीतीश विधानसभा चुनाव के परिणाम को ही अपने अगले कदम का आधार मानकर चल रहे हैं।
लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार का चुनाव एक दूसरे को हराने के लिए ही जा रहा है। ऐसे में अगर बीजेपी और ज़ीयू की सरकार बनती है तो वेल एंड गुड और फिर लोजपा को चुनाव के बाद इसमें शामिल होना है तो ठीक है। सुलह बनाए की कोशिश बीजेपी की तरफ से की जा सकती है। लेकिन अगर ज़ीयू पीछे रहता है तो बीजेपी और लोजपा साथ आएंगे।



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