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वॉशिंगटन35 मिनट पहले

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बिल गेट्स के मुताबिक, चुनौती यह है कि देश अमीर हो या गरीब, संक्रमण रोकने के लिए भारी मात्रा में ऐसे वैक्सीन बनाने होंगे जिनकी कीमत 250 रुपए तक होगी। -फाइल फोटो

  • द इकोनॉमिस्ट के वेबिनार में गेट्स ने कहा- महामारी आने से पहले ही हम फेल हो चुके थे
  • गेट्स बोले- एशिया ने यूरोप-अमेरिका की तुलना में संक्रमण पर जल्द ही पा लिया, हालांकि भारत-पाकिस्तान अभी भी खतरे में हैं

दुनिया के सबसे अमीरों में से एक बिल गेट्स का कहना है कि विड काडेविड -19 महामारी आने के पहले ही हम फेल हो चुके थे। यही कारण है कि संक्रमण के आगे हम टिक नहीं पाए। ‘ द इकोनॉमिस्ट की एडिटर इन चीफ जैनी मिंटोन बिडोस के साथ मंगलवार को वेबिनार में गेट्स ने कहा कि हम महामारी की प्रकृति को पूरी तरह से समझने में सक्षम नहीं हैं। बातचीत के चौथे अंश …

कारोना से लड़ाई में द। कोरिया और वियतनाम जैसे देशों ने मुस्तैदी का परिचय दिया। वहीं, चीन, जहां से महामारी पनपी, उसने शुरू में ही गलती कर दी। एशिया ने यूरोप-अमेरिका की तुलना में संक्रमण पर जल्द ही पा लिया। हालांकि, भारत और पाकिस्तान अभी खतरे में हैं।

लाखों करोड़ों रुपए की बर्बादी रोकने के लिए अभी खर्च करना होगा

जहां तक ​​वैक्सीन का सवाल है- 6 स्तर पर कार्य प्रगति पर है। 75 से 90 हजार करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। लाखों करोड़ रुपए की बर्बादी रोकने के लिए यह खर्च जरूरी है। सफलता के बाद ह्यूमैन ट्रायल तीसरे चरण में चला जाएगा। अनुमान है कि 2021 की पहली तिमाही में वैक्सीन तैयार हो जाएगी। कुछ स्तरों पर टेस्टिंग में थोड़ा और समय लग सकता है। 2021 मध्य तक उभरते देशों के लिए वैक्सीन तैयार होंगी। गरीब देशों के लिए यह 2022 केनर्स दौर में उपलब्ध हो जाएगा।

कई कंपनियों के प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली वैक्सीन पर काम कर रहे हैं

जॉनसन और जॉनसन और सनोफी जैसी कंपनियों जैसे वैक्सीन पर भी काम कर रहे हैं, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं। चुनौती यह है कि देश अमीर हो या गरीब, संक्रमण रोकने के लिए भारी मात्रा में ऐसे वैक्सीन बनाने होंगे जिनकी कीमत 250 रुपए तक होगी। कुल मिलाकर 3 स्तर पर समस्या अभी भी है। पहला- उस स्थिति में क्या हो जब लोग वैक्सीन का बहिष्कार करने लगें।

संयोग से खसरे की तरह 80-90% लोगों को टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है। कोरोना में 30 से 60% आबादी कोके लगाने से भी संक्रमण पर काबू पाया जा सकता है। दूसरा- विकासशील देशों में स्थिति बद से बदतर हो सकती है। चूंकि यूरोप और अमेरिका अपने आप में ही व्यस्त हैं और बहुपक्षीय भावनाएं कमजोर पड़ रही हैं इसलिए जोखिम और गरीब देशों पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है।]

परेशानी यह है कि इन देशों से आंकड़े बढ़ाने में केवल 3-4 साल लग जाते हैं और उसके बाद विश्लेषण में भी और समय लग जाता है। तीसरी सबसे बड़ी समस्या आर्थिक पक्ष है। गरीब और गरीब देश की आमदनी बैंकों और विदेश से भेजे जाने वाले पैसों पर टिकी होती हैं। ये तापसी छाप कर तापलाई बढ़ा नहीं सकते।

एक ओर जहां पहले ही उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता पर इंवेस्टमेंट कम थी, वहीं कोरोना की वजह से यह और सिकुड़ सकता है जिससे संक्रमण से लड़ने की इनकी ताकत और कमजोर होगी। ऐसी परिस्थिति में दुनिया के पास के साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं है।

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By GAUTAM

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