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नई दिल्ली22 मिनट पहलेलेखक: प्रियांक द्विवेदी

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  • हॉन्गकॉन्ग में चीन ने 1 जुलाई से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया, अब वहां चीन के खिलाफ प्रदर्शन करने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है
  • चीन पर जासूसी का आरोप भी लगा, अमेरिका में पिछले सप्ताह ही सिंगापुर का नागरिक चीन के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़ा गया
  • अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, ताइवान और ऑस्ट्रेलिया खुलकर चीन के खिलाफ आए, दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावे को भी खारिज कर दिया

4 मई को न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने एक विशेष रिपोर्ट छापी थी। इस रिपोर्ट में चीन की सरकार की एक इंटरनल रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि दुनिया भर में एंटी-चाइना सेंटीमेंट्स यानी चीन विरोधी भावना 1989 में थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार के बाद से सबसे ज्यादा है। इस रिपोर्ट को चीन के गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को सौंप दिया था।

दुनिया में एंटी-चाइना सेंटीमेंट्स बढ़ने की वजह कोरोनावायरस बताई गई थी। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया था कि कोरोनावायरस के कारण चीन के खिलाफ वातावरण बनेगा और अमेरिका से सीधा टकराव होगा।

लेकिन, सिर्फ कोरोनावायरस ही नहीं बल्कि और भी कई कारण हैं, चाहे हॉन्गकॉन्ग का मुद्दा हो या शिंज फोटोग्राफी में उइगर मुसलमानों के मानवाधिकारों का मसला हो। चाहे सीमा विवाद। इन वजहों से चीन दुनिया में चारों ओर से घिरता रहा है। लेकिन, चौंकाने वाली बात ये भी है कि घिरने के बाद भी चीन पर इसका ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

सबसे पहले बात, उन 6 कारणों की, जिनकी वजह से चीन घिरा हुआ है
1. हॉन्गकॉन्ग:
चीन ने यहां राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया। इसमें हॉन्गकॉन्ग में देशद्रोह, आतंकवाद, विदेशी हस्तक्षेप और विरोध प्रदर्शन जैसी गतिविधियों को रोकने का प्रावधान है। कानून तोड़ने पर तीन साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान भी है। कानून 1 जुलाई से लागू है और अब चीनी सुरक्षा एजेंसियां ​​काम करेगी। अभी तक ऐसा नहीं था।

2. शिंदज के कपड़े: चीन के कब्जे वाले इस प्रांत में 45% से ज्यादा आबादी उइगर मुसलमानों की है। चीन पर उइगर मुसलमानों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप है। कुछ रिपोर्ट्स के सामने आया है कि चीन उइगर महिलाओं की अस्थनन नसबंदी करवा रहा है, ताकि जनसंख्या पर काबू पाया जा सके।

3. थाईलैंड: चीन ताइवान को अपना हिस्सा बताता है और जब हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने की तैयारी चल रही थी, तब चीन में ताइवान को लेकर भी चर्चा थी कि उसे ताइवान की मिलिट्री टेकओवर कर लेनी चाहिए। हालाँकि, चीन के लिए ये इतना आसान नहीं है। ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन कहती हैं कि ताइवान दूसरा हॉन्गकॉन्ग नहीं बनेगा। ताइवान का दावा है कि चीन अक्सर मिलिट्री प्लेन में रहता है।

4. सीमा विवाद: भारत के साथ चीन का सीमा विवाद चल रहा है। जून में लद्दाख सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच हिंसक झड़प भी हो चुकी है। लेकिन, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अन्य देशों के साथ भी चीन का सीमा विवाद जारी है। इसके अलावा चीन दक्षिणी चीन सागर पर भी अपना हक जताता है। हाल ही में यहां अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने भी अपने जहाज तैनात कर दिए हैं।

5. जासूसी: अमेरिका में पिछले सप्ताह ही सिंगापुर के एक नागरिक को गिरफ्तार किया गया है। इसे अमेरिका में चीन के जासूस के तौर पर काम करने का दोषी ठहराया गया है। इसके अलावा एक चीनी रिसर्चर को भी हिरासत में लिया गया है, जिस पर चीनी सेना के साथ अपने संबंधों को छिपाने का आरोप है। इसके अलावा चीन की टेक कंपनियों हुवावे और जेडटीई को भी अमेरिका सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।

6. कोरोनायसिस: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तो कई बार सार्वजनिक रूप से कोरोनावायरस को ‘चीनी वायरस’ कह चुके हैं। कोरोनावायरस कहां से निकला? इसकी जांच के लिए मई में 73 वीं विश्व स्वास्थ्य असेंबली में एक प्रस्ताव पेश किया गया। इस प्रस्ताव का भारत ने भी समर्थन किया था। भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जेन, न्यूजीलैंड, कनाडा, कतर, सऊदी अरब, अफ्रीकी देश, यूरोपियन यूनियन, यूक्रेन, रूस और ब्रिटेन सहित 100 से ज्यादा देशों के नाम हैं।

अमेरिका-ब्रिटेन-भारत जैसे देश चीन के खिलाफ
1. अमेरिका: चीन की 11 कंपनियों पर प्रतिबंध, दोनों देशों ने एक-दूसरे के कॉन्सुलेट को बंद कर दिया

अमेरिका और चीन के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन कोरोनावायरस के इस दौर में पिछले 7 महीनों में दोनों देशों की ये तकरार खुलकर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प तो कोरोनावायरस के लिए सीधे तौर पर चीन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। वो तो ये तक कह चुके हैं कि कोरोनावायरस को छिपाने में WHO ने भी चीन की मदद की। ट्रम्प अक्सर कोरोनावायरस को ‘चीनी वायरस’ कहते हैं।

जुलाई की शुरुआत में ही अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई के डायरेक्टर क्रिस्टोफर रे ने चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा’one ‘बताया। उससे पहले 30 जून को अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी एफसीसी ने भी चीन की हुवावे और जेडटीई को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘एक’ बताया था।

जुलाई में ही अमेरिका ने टेक्सास के ह्यूस्टन स्थित चीनी कॉन्सुलेट को बंद करने का आदेश दे दिया था। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के मुताबिक, ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि चीन ‘आंतरिक सिकंदर प्रॉपर्टी’ चुरा रहा था। बारी में चीन ने भी चेंगड़ू स्थित अमेरिकी कॉन्सुलेट को बंद कर दिया।

अमेरिका ने 7 जुलाई को उन चीनी अधिकारियों पर वीजा प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया, जो अमेरिकी पत्रकार, टूरिस्ट्स, डिप्लोमैट्स और अफसरों को तिब्बत जाने से रोकने के लिए जिम्मेदार थे। जवाब में चीन ने भी कुछ अमेरिकी अफसरों पर वीजा प्रतिबंध लगा दिया।

इसके अलावा चीन के शिंदज प्रांत में उइगर मुसलमानों के मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के मामले में अमेरिका ने 11 चीनी कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिकी अफसरों के मुताबिक, ये कंपनियां 10 लाख उइगर मुसलमानों का शोषण करती थीं।

इतना ही नहीं, हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने के फैसले का अमेरिका ने भी विरोध किया था। अमेरिका का कहना था कि इस नए कानून से हॉन्गकॉन्ग के लोगों की आजादी पर खतरा पैदा हो गया है। इस पर चीन ने जवाबी कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी।

इन सबके अलावा दक्षिण चीन सागर में भी अमेरिका ने जहाज भेजे थे। कुछ दिन पहले ही चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने थिंक टैंक स्ट्रेटेजिक सिचुएशन प्रोबिंग इनिशियन ने दावा किया था कि अमेरिका के पी -8 ए (पोसाइडन) और ईपी -3 ई एयरक्राफ्ट्स ने साउथ जेना सी से चीन के झेजरे और फुजियान तक उड़ान भरी थी। कुछ देर बाद पी -8 ए वापस लौटा और फिर यह शंघाई से 76.5 किलोमीटर दूर उड़ान भरने के बाद।

2. ब्रिटेन: 5 जी नेटवर्क से चीनी कंपनी को हटाया गया, हॉन्गकॉन्ग पर भी विरोध
मई के अंत में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने डी -10 ग्रुप बनाने का आइडिया दिया था। उनका कहना था कि इस समूह में जी -7 में सभी सातों देशों के अलावा भारत, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को भी जोड़ा जाना चाहिए। इस ग्रुप का मकसद चीन के खिलाफ रणनीतिक एकजुटता बनाना होगा। जॉनसन का मानना ​​था कि सभी देश 5 जी टेक्नोलॉजीज पर मिलकर काम करते हैं, ताकि चीन की डिपेंडेंसी खत्म हो जाए।

बोरिस जॉनसन ने मई में ये आइडिया दिया और जुलाई में ब्रिटेन के 5 जी नेटवर्क से चीन की हुवावे कंपनी को हटाने का ले लिया। जॉनसन के इस फैसले के बाद ब्रिटेन के सेवा ऑपरेटरों को हुवावे के नए 5 जी इक्विपमेंट खरीदने पर पाबंदी लग गई। साथ ही ऑपरेटर्स को अपने नेटवर्क से 2027 तक हुवावे की 5 जी किट्टी भी हटानी होगी।

जॉनसन का ये फैसला चीन और हुवावे के लिए बहुत बड़ा झटका है। अमेरिका पहले ही आरोप लगा चुका है कि हुवावे के 5 जी नेटवर्क के जरिए चीन जासूसी करता है।

इससे पहले चीन ने जब हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया था, तो बोरिस जॉनसन ने चीन के इस फैसले का विरोध करते हुए हॉन्गकॉन्ग के 30 लाख लोगों को ब्रिटेन में बसने का प्रस्ताव दे दिया। उन्होंने कहा कि नए कानून हॉन्गकॉन्ग की आजादी का उल्लंघन है। हॉन्गकॉन्ग पहले ब्रिटेन का ही उपनिवेश था, लेकिन 1997 में ब्रिटेन ने इसे चीन को लौटा दिया।

इसके साथ ही हॉन्गकॉन्ग में नए कानून लागू होने के बाद ब्रिटेन ने हॉन्गकॉन्ग के साथ अपनी प्रत्यर्पण संधि सस्पेंड करने की घोषणा कर दी। इस संधि के तहत हॉन्गकॉन्ग में अपराध करने वाले अगर ब्रिटेन भाग जाते थे, तो उन्हें पकड़कर हॉन्गकॉन्ग भेजा जा सकता था। नए कानून पर ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमोनिक रॉब ने कहा कि चीन की तरफ से हॉन्गकॉन्ग पर नए कानून थोपना, ब्रिटेन की नजर में अंतर्राष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है।

इन सबके अलावा चीन के शिंदज प्रांत में उइगर मुसलमानों के मानवाधिकारों का मुद्दा भी ब्रिटेन ने उठाया था। ब्रिटेन का कहना था कि शिंदज अभियान में उइगर महिलाओं की अस्थनन नसबंदी की जा रही है।

3. भारत: 100 से ज्यादा चीनी ऐप्स बैन कीं, कारोबार के लिए नए नियम बनाए
मई की शुरुआत में लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ गया। दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं। इसी महीने भारत ने अपने एफडीआई नियमों में बदलाव किया। नए नियमों के तहत जिन देशों की सीमाएँ भारत से लगती हैं, यदि वह भारत के किसी व्यवसाय या कंपनी में इन्वेस्ट करते हैं, तो इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। पहले ये पाबंदी सिर्फ पाकिस्तान और बांग्लादेश के इन्वेस्टर्स पर ही थी।

इसके बाद हाल ही में सरकार ने जनरल फाइनेंशियल नियम 2017 में भी बदलाव किए कि जो भी देश भारत के साथ सीमा साझा करते हैं, वे सरकारी खरीद में बोली नहीं लगा सकते। हालांकि, इसमें ये भी जोड़ा गया है कि अगर कोई देश बोली लगाना चाहता है, तो उसे डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री और इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) की पंजीकरण कमेटी में रेगर्ड करना होगा। इसके अलावा उनके विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय से भी मंजूरी लेनी होगी।

इन दोनों ही नियमों में बदलावों का सबसे ज्यादा असर चीन पर ही होगा। हालाँकि, नियमों में चीन का नाम नहीं लिया गया था। लेकिन, ये दोनों ही बदलाव चीन को मैसेज देने के लिए किए गए थे।

इसके अलावा जब लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी में जब भारत-चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई, तो उसके बाद सरकार ने टिकटॉक, यूसी न्यूज़जर सहित 59 चीनी ऐप पर बैन लगा दिया। उसके बाद कुछ दिन पहले ही सरकार ने चीन की 47 ऐप्स और बैन कर दीं। अब तक सरकार 106 चीनी ऐप्स पर बैन लगा चुकी है।

4. ताइवान: चीन से सामना करने के लिए दक्षिण चीन सागर में मिलिट्री ड्रिल की
चीन और ताइवान के बीच अलग ही तरह का संबंध है। 1911 में चीन में कॉमिंगतांग की सरकार बनी। 1949 में यहाँ गृहयुद्ध स्ट्रोक गया और माओ त्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने कॉमिंगतांग की कीर्ति को समाप्त कर दिया। हार के बाद कॉमिंगतांग ताइवान चले गए।

1949 में चीन का नाम ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ पड़ा और ताइवान का ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ पड़ा। दोनों देश एक-दूसरे को मान्यता नहीं देते हैं।

चीन अक्सर ताइवान को अपना हिस्सा बताता है। लेकिन, ताइवान खुद को अलग देश मानता है। मई में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने खुलेआम चीन को चुनौती दे दी थी। उन्होंने कहा, ‘ताइवान कभी चीन के नियम-कायदे नहीं मानेगा। चीन को इस हकीकत के साथ शांति से जीने का तरीका खोजना होगा। ‘

इसके अलावा दक्षिण चीन सागर को लेकर भी चीन और ताइवान के बीच तनातनी होती रहती है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती दखलंदाजी के बीच ताइवान ने 5 दिन की मिलिट्री ड्रील की। इसमें चीन की मिसाइलों को मार गिराने पर फोकस था। इसके अलावा यहां मिराज 2000, एफ -16 फाइटर जेट और पी -3 सी एंटी सबमरीन फाइटर जेट तैनात किए जा चुके हैं। ताइवान की सेना के मुताबिक, ये फाइटर जेट्स को यहां तब तक रखा जाएगा, जब तक चीन के हमले का खतरा है।

इसके साथ ही हॉन्गकॉन्ग के प्रदर्शनकारियों को भी ताइवान का समर्थन मिला है। जब चीन ने हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया, तो हॉन्गकॉन्ग के लोगों की मदद करने के लिए ताइवान ने राजधानी ताइपे में कार्यालय भी खोल दिया। इस कार्यालय से उन लोगों को मदद मिलेगी, जो नया कानून लागू होने के बाद हॉन्गकॉन्ग से ताइवान आ रहे हैं।

5. ऑस्ट्रेलिया: कोरोना की जांच का समर्थन किया, हॉन्गकॉन्ग के लोगों को नागरिकता का प्रस्ताव
ऑस्ट्रेलिया का नाम भी उन देशों में शामिल है, जिनके संबंध पिछले कुछ महीनों में चीन से खराब हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया ने काफी पहले ही कोरोनावायरस की जांच की मांग का समर्थन कर दिया था। इससे चीन ऑस्ट्रेलिया से चिढ़ गया था। इसके बाद चीन ने ऑस्ट्रेलिया पर कुछ प्रतिबंध भी लगा दिए थे।

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने आधिकारिक रूप से दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावों को खारिज कर दिया था। ऑस्ट्रेलिया ने यूएन में कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों का कोई ‘कानूनी आधार’ नहीं है।

इन सबके अलावा ऑस्ट्रेलिया ने शिंदज और हॉन्गकॉन्ग में मानवाधिकारों का मसला भी उठाया था। चीनी कंपनी हुवावे को ऑस्ट्रेलिया के 5 जी नेटवर्क के निर्माण से रोक दिया गया था। ऑस्ट्रेलिया अक्सर चीन पर अपने घरेलू मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप भी लगाता रहता है।

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By GAUTAM

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